शिवपुरी। करैरा तहसील के ग्राम जरगवां अब्बल की जमीन कांड में तत्कालीन तहसीलदार सहित आधा दर्जन राजस्व के कर्मचारियों के एफआईआर के बाद इस मामले की जांच जितनी गहराई मे उतर रही है उतने नए राज इस कांड में सामने आ रहे है। सर्वप्रथम इस जमीन को सरकारी माना जा रहा था लेकिन इस जांच में सामने आया है कि यह जमीन सरकारी नही थी बल्कि आदिवासियों के नाम थी और यह विक्रय से वर्जित थी। यह विक्रय से वर्जित शब्द इस जमीन के खसरे से किस जादू से गायब हुआ अब इसकी जांच शुरू हो चुकी है।
जांच में सामने आया है कि जिन जमीनों पर मूल रूप से आदिवासी परिवारों का नाम दर्ज था और जिनकी बिक्री पर कानूनी रोक थी, वे पहले दो वर्तमान विधायक प्रतिनिधियों की पत्नियों के नाम दर्ज हुईं। इसके बाद विक्रय-वर्जित की एंट्री हटाकर उन्हीं जमीनों को तत्कालीन बीएमओ डॉ. प्रदीप शर्मा की पत्नी श्वेता शर्मा के नाम बेच दिया गया। अब पूरे मामले की तह तक पहुंचने के लिए पुलिस ने करैरा तहसीलदार को पत्र भेजकर संबंधित पट्टों, नामांतरण आदेशों और विक्रय-वर्जित हटाने से जुड़े सभी दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगी हैं।
कैसे बदले जमीन के मालिक
जानकारी के अनुसार ग्राम खिरिया निवासी मंगल सिंह यादव की पत्नी उर्मिला यादव ने वर्ष 2023 में सर्वे नंबर 101/1/2/3 रकबा एक हेक्टेयर भूमि तत्कालीन बीएमओ डॉ. प्रदीप शर्मा की पत्नी श्वेता शर्मा और नवल सिंह जाटव को विक्रय की। इसी तरह ग्राम खरपुरा निवासी जगत सिंह यादव की पत्नी प्रभा यादव ने सर्वे नंबर 101/1/2/5 रकबा 0.60 हेक्टेयर भूमि भी श्वेता शर्मा को बेच दी।
इसके बाद वर्ष 2025 में श्वेता शर्मा ने यही जमीन दिनारा निवासी व्यापारी उमेश गुप्ता को बेच दी। 13 मई 2025 को खसरे में उमेश गुप्ता का नामांतरण भी दर्ज हो गया, लेकिन बाद में यह नामांतरण निरस्त कर दिया गया और जमीन पर फिर से विक्रय-वर्जित की एंट्री दर्ज कर दी गई। यहीं से विवाद शुरू हुआ और व्यापारी उमेश गुप्ता ने श्वेता शर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी।
कलेक्टर की जांच में खुला पूरा मामला
व्यापारी द्वारा एफआईआर दर्ज कराने के बाद श्वेता शर्मा ने तत्कालीन कलेक्टर रविंद्र कुमार चौधरी को आवेदन देकर पूरे प्रकरण की जांच कराने की मांग की। जांच में राजस्व रिकॉर्ड में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई। इसके बाद करैरा थाने में तत्कालीन नायब तहसीलदार, बाबुओं, रिकॉर्ड प्रभारी और पटवारियों सहित कई राजस्व कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। इनमें नायब तहसीलदार अशोक श्रीवास्तव, बाबू जीवनलाल तिवारी (सेवानिवृत्त), बाबू प्रताप पुरी, रीडर लोकेंद्र श्रीवास्तव, हल्का पटवारी बृजेश यादव, पटवारी मुकेश चौधरी सहित अन्य के नाम शामिल हैं।
सबसे बड़ा सवाल-आदिवासियों की जमीन आखिर बदली कैसे?
जांच में सामने आया है कि वर्ष 2008 के खसरे में सर्वे नंबर 101/1/2/3 और 101/1/2/5 ग्राम जरगवां अब्बल निवासी बटनलाल पुत्र दुर्जना आदिवासी और पहलू पुत्र देवलाल आदिवासी के नाम दर्ज थे। यह जमीन विक्रय-वर्जित श्रेणी में थी, यानी इसकी बिक्री नहीं की जा सकती थी। लेकिन वर्ष 2010 आते-आते यही जमीनें उर्मिला यादव और प्रभा यादव के नाम दर्ज हो गईं। इसके बाद वर्ष 2013 में खसरे से विक्रय-वर्जित की एंट्री भी गायब हो गई।
अब जांच का सबसे बड़ा विषय है यह है कि आदिवासियों की जमीन का नामांतरण किस आदेश के आधार पर किया गया? विक्रय-वर्जित की शर्त किस अधिकारी ने हटाई? खसरे में नए भू-स्वामियों के नाम किसके आदेश से दर्ज हुए? यदि जमीन प्रतिबंधित थी तो उसकी रजिस्ट्री कैसे हो गई? पुलिस अब इन सवालों के जवाब तलाशने में पुलिस जुटी हुई है।
विधायक प्रतिनिधियों का भी नाम आया सामने
मामले में जिन दो महिलाओं के नाम सामने आए हैं, उनके पति वर्तमान में विधायक प्रतिनिधि हैं। मंगल सिंह यादव को चार माह पहले सहकारी विभाग में विधायक प्रतिनिधि नियुक्त किया गया था। जगत सिंह यादव वर्तमान में पीएचई विभाग में विधायक प्रतिनिधि हैं। हालांकि दोनों ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया है।
क्या बोले विधायक प्रतिनिधि
जगत सिंह यादव (विधायक प्रतिनिधि) का कहना है कि उनकी पत्नी को विधिवत पट्टा मिला था और बीएमओ की पत्नी के पास भी सभी दस्तावेज मौजूद हैं। मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है। वहीं मंगल सिंह यादव का कहना है कि उनकी पत्नी का पट्टा अलग है और आदिवासियों की जमीन अलग है। उन्होंने यह भी दावा किया कि विधायक प्रतिनिधि पद से उन्होंने पहले ही इस्तीफा दे दिया था। उधर करैरा तहसीलदार ललित शर्मा ने कहा कि पुलिस ने आवश्यक दस्तावेज मांगे हैं। विवेचना में जो भी रिकॉर्ड आवश्यक होगा, वह उपलब्ध कराया जाएगा।
अब सबकी नजर पुलिस जांच पर
राजस्व रिकॉर्ड में हुए कथित फर्जीवाड़े ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जांच में यह साबित होता है कि प्रतिबंधित आदिवासी जमीनों का नामांतरण नियमों को दरकिनार कर किया गया, तो यह मामला केवल राजस्व विभाग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें कई और जिम्मेदार अधिकारियों एवं संबंधित लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। फिलहाल पुलिस दस्तावेजों की पड़ताल कर जमीन के पूरे सफर की कड़ियां जोड़ने में जुटी हुई है।

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