शिवपुरी, काम चोरी शिक्षक एप कर रहा है और नोटिस झेल रहे प्राचार्य, मामला 28 नोटिसो का

vikas
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शिवपुरी।
शिक्षा विभाग में डिजिटल व्यवस्था लागू करने की कोशिश अब विवादों के घेरे में है। सवाल यह उठ रहा है कि जब सिस्टम पूरी तरह काम ही नहीं कर रहा, तो उसकी नाकामी की सजा आखिर मैदानी अधिकारियों को क्यों दी जा रही है ? शिवपुरी जिले में 28 संकुल प्राचार्यों को कारण बताओ नोटिस जारी होने के बाद यही बहस तेज हो गई है।

जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ने जिले के सभी 28 संकुल प्राचार्यों को तीन दिन के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। आरोप है कि उन्होंने जून-2026 में 100 प्रतिशत से कम ई-अटेंडेंस दर्ज कराने वाले शिक्षकों का उपस्थिति पत्रक भेजा, जिसके आधार पर 1 जुलाई को वेतन जारी कर दिया गया। संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर वेतन कटौती और अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

सवाल यह है कि गलती किसकी
पूरा मामला हमारे शिक्षक एप से जुड़ा है, जिसे लोक शिक्षण संचालनालय ने शिक्षकों की उपस्थिति और सेवा संबंधी कार्यों को डिजिटल बनाने के उद्देश्य से लागू किया था। लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी यह एप पूरी तरह कार्यशील नहीं हो पाया है।

शिक्षकों का कहना है कि एप में न तो क्रमोन्नति की सुविधा प्रभावी हुई, न समयमान वेतनमान, न वेतन वृद्धि, न परिवीक्षा अवधि से जुड़े कार्य और न ही पेंशन संबंधी प्रक्रियाएं शुरू हो सकीं। जिन सुविधाओं का वादा किया गया था, वे आज भी कागजों तक सीमित हैं। परिणामस्वरूप शिक्षक आज भी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि डिजिटल सिस्टम ही पूरी तरह सक्षम नहीं है तो उसकी कमियों की जिम्मेदारी संकुल प्राचार्यों पर कैसे डाली जा सकती है

नियमों की भी अलग कहानी
विवाद का दूसरा बड़ा पहलू नियमों से जुड़ा है। तत्कालीन लोक शिक्षण आयुक्त द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, यदि किसी शिक्षक की ई-अटेंडेंस दर्ज नहीं होती है तो उस दिन को पहले अवकाश माना जाएगा। निर्धारित समय के बाद उपस्थिति दर्ज करने पर आधे दिन का आकस्मिक अवकाश समायोजित किया जाना था। केवल तब, जब शिक्षक की उपलब्ध छुट्टियां समाप्त हो जाएं, वेतन कटौती की कार्रवाई का प्रावधान था।
लेकिन इस मामले में सीधे संकुल प्राचार्यों पर लापरवाही और कदाचार का आरोप लगाकर नोटिस जारी कर दिया गया। इससे विभागीय कार्रवाई की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं।

शिक्षकों का आरोप-एप सुविधा नहीं, दबाव का माध्यम बन गया
शिक्षक संगठनों का कहना है कि यदि एप वास्तव में शिक्षकों के काम आसान करता तो इसका स्वागत किया जाता। लेकिन वर्तमान स्थिति में एप से न तो सेवा संबंधी सुविधाएं मिल रही हैं और न ही प्रशासनिक प्रक्रियाएं सरल हुई हैं। इसके उलट, इसका उपयोग केवल उपस्थिति की निगरानी और कार्रवाई का आधार बनाने तक सीमित रह गया है।

दूसरी ओर प्रशासन सख्त
इसी बीच जिला प्रशासन ने शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए एक और बड़ा कदम उठाया है। डीईओ आकाश यादव ने सभी विकासखंड शिक्षा अधिकारियों (बीईओ) को निर्देश दिए हैं कि गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगे शिक्षकों को तत्काल मुक्त कर उनकी मूल शालाओं में भेजा जाए। कलेक्टर ने भी एसडीएम, तहसीलदार, आदिम जाति कल्याण विभाग और जिला परियोजना समन्वयक को पत्र जारी कर अन्य विभागों में संलग्न शिक्षकों को तत्काल स्कूलों में वापस भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो।

मुख्य सवाल अभी भी कायम
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है-जब डिजिटल व्यवस्था अभी पूरी तरह विकसित ही नहीं हुई, नियमों का पालन भी स्पष्ट रूप से नहीं हुआ और तकनीकी कमियां बनी हुई हैं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी? सिस्टम बनाने और उसे सुचारू रूप से संचालित करने वालों की, या फिर उन मैदानी अधिकारियों की जो उसी अधूरे सिस्टम के सहारे काम करने को मजबूर हैं? यही सवाल अब शिक्षा विभाग की इस कार्रवाई के केंद्र में है।

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