शिवपुरी। लखनऊ में हुए भीषण कोचिंग हादसे के बाद जागा शिवपुरी जिला प्रशासन अब फिर से सुस्ती के आलम में लौटता दिखाई दे रहा है। कलेक्टर अर्पित वर्मा के कड़े निर्देशों के बाद शुरू हुई फायर सेफ्टी जांच और ताबड़तोड़ नोटिस की कार्रवाई महज 12 दिनों के भीतर कागजों तक सिमट कर रह गई है। नगर पालिका द्वारा शहर के 70 बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को जारी किया गया 3 दिन का सील करने का अल्टीमेटम पूरी तरह बेअसर साबित हुआ है।
नोटिस की म्याद बीते 10 दिन से ज्यादा का समय हो चुका है, लेकिन 70 में से महज 6 प्रतिष्ठानों ने ही अपनी फायर एनओसी (No Objection Certificate) जमा कराई है। बाकी 64 रसूखदार कारोबारियों ने प्रशासन के नोटिस का जवाब तक देना उचित नहीं समझा।
मैरिज गार्डन और अस्पतालों में मंडरा रहा खतरा, कारोबारी बेपरवाह
प्रशासनिक सख्ती के शुरुआती दौर में नगर पालिका ने शहर के 45 मैरिज गार्डन, 12 निजी अस्पतालों, होटलों और अन्य व्यावसायिक केंद्रों पर शिकंजा कसते हुए नोटिस थमाए थे। इनमें स्पष्ट चेतावनी थी कि 3 दिन के भीतर फायर एनओसी न देने पर प्रतिष्ठान सील कर दिए जाएंगे। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि शादियों के सीजन में मैरिज गार्डनों और हर वक्त मरीजों से भरे रहने वाले निजी अस्पतालों में अगर कोई अग्निकांड होता है, तो भारी भगदड़ और जनहानि हो सकती है। इसके बावजूद प्रतिष्ठान संचालक इसे महज एक प्रशासनिक खानापूर्ति मानकर बैठे हैं और जिम्मेदार अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।
शपथ पत्र और रेत की बाल्टी पर पिघला प्रशासन, खोल दीं सील कोचिंगें
प्रशासनिक लापरवाही का सबसे बड़ा उदाहरण उन 12 कोचिंग संस्थानों में देखने को मिला, जिन्हें तहसीलदार सिद्धार्थ शर्मा ने फायर सेफ्टी इंतजाम न होने पर सील किया था। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने का हवाला देकर प्रशासन ने इन कोचिंगों को दोबारा खोलने की अनुमति दे दी। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इसके बदले इन संस्थाओं ने फायर एनओसी नहीं, बल्कि एक साधारण शपथ पत्र और आग बुझाने वाले सिलेंडर व रेत की बाल्टी रखकर औपचारिकता पूरी कर ली।
कोचिंग संचालकों ने लिख कर दे दिया है कि भविष्य में कोई घटना होती है तो जिम्मेदारी उनकी होगी। सवाल यह उठता है कि क्या किसी हादसे की स्थिति में बच्चों की जान की कीमत इस कागज के टुकड़े से पूरी हो जाएगी? क्या सरकारी नियमों की पूर्ति सिर्फ एक शपथ पत्र से संभव है?
यह है फायर एनओसी की असली प्रक्रिया
नियमानुसार, किसी भी व्यावसायिक भवन को फायर एनओसी लेने के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होता है। शहरी क्षेत्रों में ग्वालियर नगरीय निकाय के संयुक्त संचालक और ग्रामीण क्षेत्रों में जिला कलेक्टर के माध्यम से प्रक्रिया आगे बढ़ती है। आवेदन के बाद एक विशेषज्ञ टीम मौके पर जाकर बिल्डिंग में इमरजेंसी एग्जिट (निकासी द्वार), फायर हाइड्रेंट, अलार्म सिस्टम और स्टाफ की ट्रेनिंग की जांच करती है। इस पूरी प्रक्रिया में 15 दिन से लेकर एक महीने का समय लगता है, जिसके बाद ही वैध एनओसी जारी होती है। समय-समय पर इसका ऑडिट कराना भी अनिवार्य है। लेकिन शिवपुरी में इस पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया को दरकिनार कर केवल अस्थायी जुगाड़ को तवज्जो दी जा रही है।
जिम्मेदारों के बयान
हमने शहर में करीब 70 प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी किए थे। इनमें से केवल 5 या 6 लोगों ने ही कार्यालय में अपने प्रमाणपत्र पेश किए हैं। अब जो शेष रह गए हैं, उनके खिलाफ हम जल्द ही आगे की वैधानिक कार्रवाई करने जा रहे हैं। रंजीत खापरे, सब इंजीनियर, नगर पालिका शिवपुरी
जिन 12 कोचिंग संस्थानों को सील किया गया था, उनके संचालकों ने अपने परिसरों में फायर सिलेंडर और रेत से भरी बाल्टी जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं कर ली हैं। सभी से शपथ पत्र लिया गया है कि भविष्य में किसी भी हादसे के जिम्मेदार वे स्वयं होंगे। छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए उन्हें फिलहाल खोलने की अनुमति दी गई है। आगे वे फायर एनओसी भी ले लेंगे। सिद्धार्थ शर्मा, तहसीलदार, शिवपुरी
करियर के लिए लाइफ की रिस्क मत लेना - कोचिंग में यह जरूर चेक करना
भवन में फिक्स फायर सिस्टम स्थापित है या नहीं।
पानी की क्षमता कम से कम 10,000 लीटर है या नहीं।
भवन में 2 स्थान पर इमरजेंसी गेट है या नहीं।
भवन में ऑटोमेटिक लॉक डोर तो नहीं है।
कहीं कोचिंग क्लास बेसमेंट में तो नहीं लगती।
भवन में ऑटोमेटिक डिटेक्शन सिस्टम है या नहीं।
भवन में स्थापित सभी फायर सिस्टम ऑटो मोड पर है या नहीं।
प्रत्येक तीन माह में मॉक ड्रिल का आयोजन होता है या नहीं।
बच्चों को फायर सेफ्टी के बारे में जागरूक किया जाता है या नहीं।
विद्यार्थियों के लिए फ्यूम मॉस्क उपलब्ध हैं या नहीं।
भवन का बेसमेंट यदि 200 वर्गमीटर से अधिक है तो स्प्रिग्लर्स है या नहीं।
सभी स्टॉफ को फायर एक्टिग्यूशर चलाने की ट्रेनिंग मिल गई है या नहीं।
सिक्योरिटी गार्ड को हाईडेंट सिस्टम चलाने की ट्रेनिंग मिल गई है या नहीं।
भवन में एक्जिट साइन चस्पा है या नहीं।
भवन में निर्गम एरिया (EXIT) में कोई भी इलेक्ट्रिक उपकरण एवं पैनल तो नहीं है।
फायर पंप एवं डिटेक्शन सिस्टम, डीजी सेट से बायपास लाइन से कनेक्ट है या नहीं।
डीजी सेट, रिफ्यूज एरिया अथवा गेट पर स्थापित तो नहीं कर दिया।
भवन से धुआं बाहर निकलने के लिए प्रकृतिक वेंटीलेशन है या नहीं।
लेटेस्ट फायर ऑडिट (12 महीने से पुराना नहीं होना चाहिए) है या नहीं।
भवन या परिसर का लेटेस्ट इलेक्ट्रिक सेफ्टी सर्टिफिकेट है या नहीं।

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