एक्सरे ललित मुदगल @ शिवपुरी। शिवपुरी कलेक्टर अर्पित वर्मा ने सरकारी और आदिवासियों की जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराने का टास्क बना रखा है। इस मामले में सफलता भी मिल रही है,लेकिन अब कलेक्टर शिवपुरी को शिवपुरी जिले में चलने वाली 108 लेट जानलेवा एक्सप्रेस को समय की पटरी पर लाने का टास्क सर्वप्रथम रखना होगा, क्योंकि 24 घंटे की लाइफलाइन की लेट सेवा बनने के कारण कोख में कब्र बन रही है,नवजात को अपनी जान से हाथ धोना पडा रहा है। पिछले 7 दिन मे 3 मामले हमारे सामने ऐसे आए है जहां 108 गाडी के अपने निर्धारित समय पर नहीं पहुंची है। अभी कुछ घंटे पहले के मामले में तहसीलदार को एंबुलेंस बनना पडा।
शिवपुरी जिले में संचालित 108 जननी एक्सप्रेस को कॉल करने पर समय पर नहीं आने के कारण प्रसूता सहित शिशु की जान संकट में आ जाती है। कई मामले में पीड़ित अपने वाहन से प्रसूता को लेकर अस्पताल चला जाता है,लेट एक्सप्रेस की खबर जब सामने आती है जब कोई हादसा हो जाता है,अभी तक स्वास्थ्य विभाग ने हर हादसे के बाद जांच और कार्रवाई के आदेश तो दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी हालात जस के तस बने हुए हैं। अब सवाल यह है कि **क्या नए कलेक्टर इस लेट एक्सप्रेस को पटरी पर ला पाएंगे या फिर अगली त्रासदी का इंतजार करना पड़ेगा?
चार दिन पहले पोहरी में कोख में ही बुझ गई थी एक जिंदगी
महज चार दिन पहले पोहरी क्षेत्र के छर्च गांव में भी एंबुलेंस की देरी के कारण एक गर्भवती महिला समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकी थी। आरोप है कि इसी देरी के चलते उसके गर्भ में पल रहे नवजात की मौत हो गई थी। उस घटना के बाद प्रशासन ने जांच का भरोसा दिया, लेकिन व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नजर नहीं आया।
अब बदरवास में फिर नवजात की मौत
बुधवार को बदरवास विकासखंड के ग्राम बसाई में लगभग वही कहानी दोहराई गई। गांव निवासी देवेंद्र जाटव की पत्नी काजल जाटव को दोपहर करीब 2:50 बजे प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजनों ने तत्काल 108 एंबुलेंस को फोन किया, लेकिन आरोप है कि उन्हें बताया गया कि एंबुलेंस करीब दो घंटे बाद पहुंचेगी।
गर्भवती की हालत बिगड़ती देख परिवार के सामने कोई विकल्प नहीं बचा। मजबूरी में 1500 रुपए किराए पर ट्रैक्टर-ट्रॉली की व्यवस्था कर काजल को अस्पताल ले जाया गया। रास्ते में ही उसने एक बच्ची को जन्म दे दिया। शाम करीब 7 बजे जब परिवार बदरवास सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचा तो डॉक्टरों ने नवजात को मृत घोषित कर दिया। परिजनों का आरोप है कि यदि 108 एंबुलेंस समय पर पहुंच जाती तो उनकी बच्ची आज जीवित होती।
बैराड़ में सड़क किनारे हुआ प्रसव, तहसीलदार बने एंबुलेंस
राजपुरा (टपरा) निवासी संजू आदिवासी को प्रसव पीड़ा होने पर परिजनों ने 108 सेवा को फोन किया, लेकिन काफी देर तक एंबुलेंस नहीं पहुंची। बारिश के बीच मजबूर परिवार महिला को बाइक से अस्पताल ले जाने लगा। गोन्दोलीपुरा के पास दर्द असहनीय हो गया और महिला को सड़क किनारे ही बच्चे को जन्म देना पड़ा। सूचना मिलने पर तहसीलदार द्रगपाल सिंह बैस मौके पर पहुंचे और अपनी सरकारी गाड़ी से जच्चा-बच्चा को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया। डॉक्टरों ने दोनों को स्वस्थ बताया, लेकिन यह घटना भी 108 सेवा की समयबद्धता पर गंभीर सवाल छोड़ गई।
हर बार जांच... लेकिन नहीं बदलती तस्वीर
जिले में यह पहला मामला नहीं है। सड़क हादसों में घायल लोगों को समय पर एंबुलेंस नहीं मिलना, गर्भवती महिलाओं का निजी वाहन, ट्रैक्टर-ट्रॉली या बाइक से अस्पताल पहुंचना अब आम शिकायत बनती जा रही है। हर घटना के बाद जांच बैठती है, जिम्मेदारों से स्पष्टीकरण मांगा जाता है, लेकिन कुछ दिन बाद मामला ठंडा पड़ जाता है और 108 सेवा फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट आती है।
कलेक्टर के सामने अब सबसे बड़ा सवाल
शिवपुरी जिले की आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था अब केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय नहीं रह गई है। यह सीधे-सीधे जिला प्रशासन की कार्यक्षमता की परीक्षा बन चुकी है।अब लोगों की नजर इस बात पर है कि क्या कलेक्टर जिले की 24 घंटे संचालित 108 एंबुलेंस सेवा की वास्तविक मॉनिटरिंग कर पाएंगे? क्या एंबुलेंस के रिस्पॉन्स टाइम की जवाबदेही तय होगी? क्या ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त एंबुलेंस उपलब्ध कराई जाएंगी? या फिर जांच के आदेशों के बाद यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा और अगली त्रासदी तक सब कुछ सामान्य मान लिया जाएगा?
अब जनता को जांच नहीं, परिणाम चाहिए
108 एंबुलेंस सेवा का उद्देश्य आपात स्थिति में जीवन बचाना है। लेकिन यदि यही सेवा समय पर नहीं पहुंचे और मरीजों को ट्रैक्टर-ट्रॉली, बाइक या सड़क किनारे प्रसव जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़े, तो यह केवल तकनीकी खामी नहीं बल्कि पूरी आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। लगातार सामने आ रही घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि शिवपुरी में 108 एंबुलेंस सेवा को पटरी पर लाना अब जिला प्रशासन के लिए 24 घंटे का सबसे बड़ा टास्क बन चुका है। जनता अब जांच के आदेश नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाला सुधार चाहती है।

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