शिवपुरी, बुआ की अनोखी विदाई, जीवन भर बांटी शिक्षा, जाते-जाते बच्चों के दे गई उपहार

vikas
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खनियाधाना। रिटायरमेंट (सेवानिवृत्ति) का दिन हर शासकीय कर्मचारी के लिए बेहद भावुक होता है, लेकिन शिवपुरी जिले के खनियाधाना में एक शिक्षिका ने अपनी विदाई को हमेशा के लिए यादगार और समाज के लिए प्रेरणादायक बना दिया। बामोर कलां के शासकीय प्राथमिक विद्यालय चौकाखेड़ा में पदस्थ वरिष्ठ शिक्षिका श्रीमती सरोज गुप्ता (जिन्हें लोग प्यार से 'सरोज बुआ' कहते हैं) ने अपने सेवा निवृत्त होने पर स्कूल के नन्हे-मुन्ने बच्चों को ₹30,000 की लागत का एक शानदार झूला भेंट किया। 

उनकी इस अनूठी पहल ने न केवल बच्चों के चेहरों पर खुशी ला दी, बल्कि समाज को सरकारी स्कूलों के प्रति अपने दायित्वों को निभाने का एक बेहद खूबसूरत और सकारात्मक संदेश भी दिया है। उनकी यह विदाई महज एक रस्म न रहकर सेवा-भाव का एक अद्भुत संगम बन गई।

समारोह को यादगार बनाने की पहल बुआ जी के भतीजे ने की। उन्होंने जन शिक्षक श्री अनिल शर्मा के माध्यम से बीआरसीसी  संजय भदौरिया से आग्रह किया कि बुआ जी की विदाई कुछ ऐसी हो, जो वर्षों तक लोगों के दिलों में बस जाए। इस पर बीआरसीसी  भदौरिया ने सुझाव दिया कि यदि विद्यालय के बच्चों के लिए कोई स्थायी उपयोगी सामग्री भेंट की जाए तो वह सेवानिवृत्ति के बाद भी उनकी सेवाओं की जीवंत पहचान बनी रहेगी। इस प्रेरणादायक सुझाव को सहर्ष स्वीकार करते हुए श्रीमती सरोज गुप्ता ने विद्यालय के नन्हे-मुन्ने विद्यार्थियों के लिए लगभग ₹30,000 की लागत का आकर्षक झूला भेंट करने का निर्णय लिया।

समारोह में संकुल प्राचार्य श्री सुरेंद्र सिंह यादव, जन शिक्षा केंद्र प्रभारी श्री मुकेश तिवारी, श्री मुकेश पटेरिया, श्री जगदीश महते, श्री हरिकृष्ण स्वर्णकार, श्री धनीराम जाटव, श्री अनिल शर्मा सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, जन शिक्षक, जनप्रतिनिधि एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम में अपने उद्बोधन में  बीआरसी संजय भदोरिया ने कहा कि समाज के सकारात्मक सहयोग से ही विद्यालयों का संचालन और बेहतर तरीके से हो सकता है यह खुशी का विषय है। 

खनियाधाना में हमें विभिन्न क्षेत्रों में समाज का सहयोग मिलता है तथा सरकारी स्कूलों में समय-समय पर दानदाताओं द्वारा सहयोग किया जाता है   वहीं कार्यक्रम में उपस्थित  सभी वक्ताओं ने श्रीमती सरोज गुप्ता  के समर्पित एवं उत्कृष्ट शिक्षकीय जीवन की सराहना करते हुए कहा कि एक शिक्षक की वास्तविक पहचान केवल सेवा अवधि से नहीं, बल्कि समाज और विद्यार्थियों पर छोड़ी गई अपनी कार्यों से विशिष्ट पहचान है। 

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