शिवपुरी। शिवपुरी के गर्भ से उदय हुए अंतरराष्ट्रीय जानकी सेना संगठन ने माता जानकी के जन्मोत्सव के मप्र को सरकारी स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए 14 चरण अभियान के नाम से अपना आंदोलन शुरू किया है। संगठन के उदय से आज तक के सफर की जानकारी देते हुए जेएसएस के संगठन के पदाधिकारियों ने बताया कि मप्र के सांस्कृतिक विभाग माता सीता के जन्मोत्सव के कार्यक्रम सरकारी रूपरेखा से कराए। इससे माता जानकारी के चरित्र का प्रचार होगा और वर्तमान युग में यह अत्यंत आवश्यक है।
शहर के नक्षत्र गार्डन में आयोजित कार्यक्रम में जानकी सेना संगठन के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रम रावत ने कहा कि पूरे देश में हर वर्ष भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव रामनवमी के रूप में बड़े उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है, लेकिन माता सीता के जन्मोत्सव जो वैशाख माह की 9वीं तिथि को होता है इस प्राकट्य दिवस को लेकर सरकार की ओर से कोई विशेष आयोजन नहीं किया जाता। उन्होंने इसे सांस्कृतिक असंतुलन बताते हुए कहा कि माता सीता भारतीय संस्कृति, त्याग, धैर्य और मर्यादा की सर्वोच्च प्रतीक हैं।
रावत ने कहा कि माता सीता ने भगवान श्रीराम की मर्यादा की रक्षा के लिए 14 वर्षों का वनवास सहा और इसी कालखंड में लव-कुश जैसे वीर पुत्रों का पालन-पोषण किया। ऐसे में उनके जन्मोत्सव को भी समान सम्मान मिलना चाहिए। संगठन की मांग है कि शाख शुक्ल नवमी को जानकी उत्सव के रूप में सरकारी स्तर पर घोषित किया जाए तथा मध्य प्रदेश साहित्य कला अकादमी के कलाकारों द्वारा भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। संगठन इस दिन सरकारी अवकाश नहीं चाहता है लेकिन माता जानकी के कार्यक्रम सरकारी स्तर पर चाहता है। उन्होंने बताया कि यह मांग पहली बार मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से राष्ट्रीय स्तर पर उठाई गई है। संगठन का मानना है कि इससे भारतीय संस्कृति और सनातन परम्पराओं के संरक्षण को नई दिशा मिलेगी।
संगठन के राष्ट्रीय महासचिव एनपी सिंह बॉबी राजा ने
शिवपुरी समाचार से बातचीत करते हुए कहा कि माता जानकी का जीवन हमारे पग पग पर चरितार्थ होता है। सनातन संस्कृति की बात करे तो माता सीता का प्राकट्य धरती की गोद से हुआ था और अंत में माता सीता जब धरती फटी थी उसमे समा गई थी। इसका अर्थ है कि इस धरती पर आने वाले सभी मनुष्य प्रकृति की गोद से आते है और प्रकृति में ही समा जाते है। यह हमें शिक्षा देता है कि हमें प्रकृति की रक्षा करनी चाहिए और और माता के समान ही आदर देना चाहिए।
माता सीता ने अपने पति के वचन के लिए राजमहल का त्याग कर वनवास जाने का निर्णय लिया। माता जानकी राजा सगर के कुल की पुत्रवधू और जनकपुरी की राजकुमार थी,सामाजिक परिदृश्य से देखे तो वह साधारण महिला नहीं थी,लेकिन फिर भी उन्होंने अपने ससुराल और मायके पक्ष की मर्यादा का ध्यान रखते हुए एक बेटी,एक बहु और एक पत्नि की आदर्श उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत किया। वर्तमान युग में हमारी बहन बेटियों को जानकी माता के इस आदर्श की प्रेरणा का पालन करती है तो हर घर स्वर्ग सा हो जाऐगा।
हमारे यहां कहा जाता है कि बच्चे की प्रथम गुरु उसकी मॉ होती है। माता जानकी ने जंगल मे अपने पुत्रों को उच्च संस्कार दिए थे,हमने श्रीराम चरित मानस और वाल्मीकि रामायण में अध्ययन किया है कि लव कुश की युद्ध शैली क्या थी,कुल मिलाकर,त्याग और आदर्श का पूरा एक महाग्रंथ माता जानकी का जीवन है। इस कलयुग मे माता जानकी का संपूर्ण जीवन आदर्शों से भरा है अब उन आदर्शों का प्रचार प्रसार होना आवश्यक है कि एक नारी की मर्यादा क्या होती है।
14 चरण वनवास के 14 चरण अभियान के
माता जानकी के प्राकट्य दिवस को जानकी उत्सव के रूप में सरकारी स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए संगठन ने 14 चरण अभियान शुरू किया है। इस अभियान में सर्वप्रथम पत्र लिखकर प्रदेश के मुखिया से मांग करेंगे,पद यात्रा,साइकिल यात्रा,जन जागरण यात्रा सहित कई कार्यक्रम बताए। अगर सरकार इससे भी नहीं मानती है तो हम सैनिक अपने रक्त से लिखे खतों को सीएम तक पहुंचाएंगे और अंत में माता जानकी का अखंड नाम लेकर भोपाल में अखंड भूख हड़ताल शुरू कर देगें।
12 साल में एक लाख सदस्यों तक पहुंचा संगठन
जानकी सेना संगठन की स्थापना 19 सितंबर 2014 को शिवपुरी से हुई थी। संगठन की शुरुआत एक छोटे सामाजिक-सांस्कृतिक अभियान के रूप में हुई थी, लेकिन समय के साथ यह देशव्यापी संगठन बन गया। वर्तमान में देश के 15 राज्यों में संगठन के करीब 98 हजार 700 सदस्य सक्रिय हैं। संगठन सुंदरकांड पाठ, धार्मिक आयोजन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय आध्यात्मिक विरासत को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहा है। अब "जानकी उत्सव" को सरकारी मान्यता दिलाने की मांग को संगठन अपनी सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मुहिम के रूप में आगे बढ़ा रहा है।

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