शिवपुरी। प्रदेश में समान न्याय और सिद्धांत और समानता की बात चल रही है,होना भी चाहिए,प्रदेश के प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार है,इसी समानता के अधिकार के तहत सतनवाड़ा के किसानों ने कलेक्टर को एक आवेदन दिया है। इस आवेदन मे उल्लेख किया है कि सुल्तान होटल वाली जमीन के नियम से हमें भी जमीन मिलनी चाहिए,किसानों ने सुल्तान होटल की जमीन के विनिमय के केस के संपूर्ण दस्तावेज कलेक्टर अर्पित वर्मा को सौंपे है। यह आवेदन ओर सुल्तान होटल वाला नियम शिवपुरी जिले के उन सभी किसानों के रास्ते खोलेगा जिनकी भूमि माधव टाइगर रिजर्व ने कब्जा कर लिया है।
अब सुल्तान होटल को दिए जाने वाली जमीन का नियम प्रशासन की गले हड्डी बन सकता है। आवेदकों के अनुसार सुल्तान होटल वाली जमीन मप्र शासन ने बदले में दी हैं। अब कलेक्टर शिवपुरी को या तो इन किसानों को फोरलेन पर खाली पड़ी राजस्व की जमीन को किसानों को देनी होगी,या सुल्तान होटल वाली जमीन का केस रीओपन करना पडेगा।
पहले आप समझे इस मामले को
सतनवाडा में निवास करने वाले किसान कैलाश पुत्र कल्ला धाकड़, दुक्खो बाई धाकड़, भोलाराम पुत्र रतन सिंह धाकड़ सहित अन्य भूस्वामियों ने कलेक्टर शिवपुरी को आवेदन दिया है कि हमारी कृषि भूमि माधव टाइगर रिजर्व की सीमा के अंदर चली गई है। इस कारण हम अपनी कृषि भूमि पर खेती नहीं कर सकते,अब यह जमीन केवल हमारे नाम का कागज का टुकड़ा बन चुकी है।
आवेदक किसानों के अनुसार हल्का रायपुर धमकन स्थित उनकी निजी कृषि भूमि सर्वे क्रमांक 226 रकबा 0.83 हेक्टेयर एवं सर्वे क्रमांक 227 रकबा 0.7500 हेक्टेयर राजस्व अभिलेखों में आज भी उनके नाम दर्ज है। लेकिन माधव नेशनल पार्क और बाद में माधव टाइगर रिजर्व की सीमा विस्तार तथा बाउंड्री निर्माण के बाद उक्त भूमि वन विभाग की सीमा के भीतर चली गई, जिससे वे वर्षों से खेती और भूमि उपयोग के अधिकार से वंचित हैं।
पटवारी प्रतिवेदन में सीमांकन असंभव बताया गया
किसानों का कहना है कि उन्होंने भूमि का सीमांकन कराने एवं वास्तविक कब्जा दिलाने के लिए कई बार राजस्व विभाग से गुहार लगाई। इस संबंध में पटवारी प्रतिवेदन दिनांक 24 नवंबर 2025 में उल्लेख किया गया कि सर्वे क्रमांक 226 एवं 227 की भूमि वन विभाग की बाउंड्री के अंदर स्थित है तथा वन विभाग से सीमा विवाद होने के कारण सीमांकन किया जाना संभव नहीं है। आवेदकों का तर्क है कि जब स्वयं राजस्व विभाग भूमि के वन विभाग की सीमा के भीतर होने की स्थिति स्वीकार कर चुका है, तब उन्हें भूमि का वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा है और उनकी निजी संपत्ति केवल कागजों तक सीमित होकर रह गई है।
वर्ष 2016 के आदेश का दिया हवाला
आवेदन में किसानों ने एक पुराने प्रकरण का विस्तृत उल्लेख करते हुए बताया कि हल्का सतनवाड़ा कलां के सर्वे क्रमांक 179 रकबा 1.8500 हेक्टेयर भूमि, जो सुल्तान पुत्र कासिम खां के नाम दर्ज थी, किसानों के अनुसार उक्त भूमि पंचायत नर्सरी के अंतर्गत आने के कारण न्यायालय नायब तहसीलदार शिवपुरी के प्र.क्र.-257/2015-16/बी-121 आ.दि.-08.06.2016 से यह भूमि मध्य प्रदेश शासन के नाम दर्ज कर,दि. 14/07/2016 को तहसीलदार द्वारा पूर्व में दर्ज भूमि प्रकार निजी से शासकीय में संशोधन किया गया। इस प्रकार वर्ष 2016 में उक्त भूमि का स्वरूप परिवर्तित कर शासन के नाम दर्ज किया गया।
आवेदकों का दावा है कि इसके उपरांत संबंधित भूमि स्वामी सुल्तान पुत्र कासिम खां को उक्त सतनवाड़ा कलां की भूमि सर्वे क्रमांक 179 के बदले राहत स्वरूप पटवारी हल्का सतनवाड़ा खुर्द के श्यामपुर मौजा में राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-3 (वर्तमान राष्ट्रीय राजमार्ग-46) के समीप राजस्व सर्वे क्रमांक-1 की भूमि उपलब्ध कराई गई थी। इसी भूमि पर वर्तमान में सुल्तान होटल, डीजल पम्प आदि है।
समानता के आधार पर राहत की मांग
किसानों ने आवेदन में कहा है कि यदि वर्ष 2016 में सार्वजनिक प्रयोजन से प्रभावित भूमि स्वामी को वैकल्पिक भूमि प्रदान कर राहत दी जा सकती है, तो वर्तमान में माधव टाइगर रिजर्व की सीमा के भीतर आ चुकी उनकी भूमि के मामले में भी समान न्याय और समानता के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए।
उन्होंने मांग की है कि उन्हें भी सतनवाड़ा क्षेत्र अथवा राष्ट्रीय राजमार्ग-46 के आसपास उपलब्ध शासकीय भूमि में समतुल्य रकबे की कृषि भूमि विनिमय अथवा स्थानांतरण के रूप में प्रदान की जाए। जिस प्रकार से सुल्तान पुत्र कासिम खां को राहत स्वरूप पटवारी हल्का सतनवाड़ा खुर्द के श्यामपुर मौजा में राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-3 (वर्तमान राष्ट्रीय राजमार्ग-46) के समीप राजस्व सर्वे क्रमांक-1 अथवा वर्तमान में 1/1/2/2/1 की भूमि उपलब्ध कराई गई थी।
आवेदकों ने कलेक्टर शिवपुरी से मांग की है कि—
राजस्व एवं वन विभाग की संयुक्त टीम द्वारा स्थल निरीक्षण कराया जाए। सर्वे क्रमांक 226 एवं 227 की भूमि के माधव टाइगर रिजर्व की सीमा के भीतर होने की स्थिति का सत्यापन कराया जाए। महत्वपूर्ण बात यह है कि किसानों ने अपने दावे के समर्थन में खसरा-बी-1 की प्रतियां, पटवारी प्रतिवेदन दिनांक 24 नवंबर 2025 तथा सीमांकन संबंधी दस्तावेज भी आवेदन के साथ संलग्न किए हैं। अब यह देखना होगा कि जिला प्रशासन और वन विभाग संयुक्त जांच में क्या तथ्य सामने लाते हैं तथा किसानों की मांग पर क्या निर्णय लिया जाता है।

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