शिवपुरी, डॉ वर्मा ने जांच टीम के रोके कदम, 6 माह मे शिवपुरी नही आ पाया जांच दल

vikas
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शिवपुरी।
शिवपुरी मेडिकल कॉलेज के एक्स डीन डॉ केवी वर्मा के खिलाफ लगे आरोपो की जांच करने बनी जांच टीम के कदम रोक दिए है। जांच दल 6 माह मे शिवपुरी नही पहुच पाया है। यह खबर दर्शाती है कि जांच टीमे किस प्रकार जांच करती है,इस कारण डॉक्टर केवी वर्मा लगे गंभीर आरोप फाइलो में कैद होकर रह गए। आरोपों के घेरे में रहे डॉ. वर्मा अब भी मेडिकल कॉलेज में कार्यरत हैं।

The investigation into the allegations leveled against Dr. K.V. Verma, the former Dean of Shivpuri Medical College, has not yet begun, even after six months

इस मामले ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन की कार्यप्रणाली और चिकित्सा शिक्षा विभाग की कार्रवाई पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि जांच के लिए बनाई गई चार सदस्यीय टीम को 15 दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन आधा साल गुजरने के बाद भी जांच शुरू तक नहीं हो सकी।

शिकायतों के बाद बनी थी जांच टीम
जानकारी के अनुसार अगस्त 2024 में पूर्व डीन डॉ. केवी वर्मा के खिलाफ एक के बाद एक कई शिकायतें स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सा शिक्षा आयुक्त तक पहुंची थीं। शिकायतों में वित्तीय अनियमितताओं से लेकर प्रशासनिक नियमों के उल्लंघन तक के आरोप लगाए गए थे।

इन शिकायतों के आधार पर अपर कलेक्टर शिवपुरी ने प्रारंभिक जांच की थी। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद डॉ. वर्मा को नोटिस भी जारी किए गए। इसके बाद 10 दिसंबर 2025 को भोपाल स्थित संचालनालय चिकित्सा शिक्षा द्वारा एक चार सदस्यीय जांच समिति गठित की गई। समिति में अपर संचालक वित्त संचालनालय चिकित्सा शिक्षा महक सिंह को अध्यक्ष बनाया गया था। वहीं ग्वालियर मेडिकल कॉलेज के प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. जितेंद्र अग्रवाल, उप संचालक डॉ. नितेश सिंह पटेल और सहायक संचालक डॉ. विजय कुमार गौड़ को सदस्य के रूप में शामिल किया गया था।

कार्यालय आयुक्त लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, मध्यप्रदेश द्वारा आदेश जारी कर 15 दिन के भीतर जांच पूरी करने के निर्देश दिए गए थे। लेकिन छह महीने बाद भी जांच टीम का शिवपुरी नहीं पहुंचना कई सवाल खड़े कर रहा है।

वर्तमान डीन ने भी माना, नहीं आई जांच टीम
मेडिकल कॉलेज के वर्तमान डीन डॉ. डीएस परमहंस ने स्वीकार किया कि दिसंबर 2025 में जांच के आदेश जारी हुए थे, लेकिन अब तक जांच दल शिवपुरी नहीं पहुंचा। उन्होंने बताया कि इस संबंध में भोपाल संचालनालय से दो से तीन बार पत्राचार भी किया जा चुका है। अब पूरा मामला वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर लंबित है।

पूर्व डीन पर ये थे प्रमुख आरोप,नर्स का प्रताडित किया 
मेडिकल कॉलेज की एक स्टॉफ नर्स लोकेश नामदेन ने आत्महत्या का प्रयास किया था। नर्स ने आरोप लगाया था कि डॉ. वर्मा लगातार उन्हें मानसिक रूप से परेशान करते थे। आरोप यह भी था कि बिना पर्याप्त कारण मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें मानसिक आरोग्यशाला भेज दिया गया और बाद में जॉइनिंग को लेकर भी परेशान किया गया।

आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित कोर्स में प्रवेश
जांच शिकायतों में यह भी सामने आया था कि मेडिकल कॉलेज में कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में प्रवेश दे दिया गया। आरोप है कि अधिष्ठाता के स्टेनो जुगल यादव और वाहन चालक विनोद रावत को नियमित कोर्स में दाखिला दिया गया, जबकि दोनों पहले से कॉलेज में कार्यरत थे। शिकायत में इसे नियम विरुद्ध बताते हुए कहा गया कि उन्हें एक पद से कार्यमुक्त किए बिना दोहरी सुविधा दी गई।

पत्नी की नियुक्ति पर सवाल
डॉ. वर्मा पर अपनी पत्नी रिंकी वर्मा को कॉलेज में डायटीशियन के रूप में नियुक्त कराने का भी आरोप लगा। शिकायत के अनुसार नियुक्ति से पहले किसी सक्षम प्राधिकारी या समिति से अनुमति नहीं ली गई।

मध्यप्रदेश सिविल सेवा आचरण नियमों के अनुसार अपने परिजनों को अधीनस्थ संस्थान में नियुक्त करने से पहले विशेष अनुमति और पारदर्शिता जरूरी होती है, लेकिन आरोप है कि इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

गर्ल्स हॉस्टल में पुरुष सहायक वार्डन
मामले में यह आरोप भी शामिल था कि कॉलेज में कई महिला प्राध्यापक और सह-प्राध्यापक उपलब्ध होने के बावजूद एक पुरुष कर्मचारी को इंटर्न गर्ल्स हॉस्टल का सहायक वार्डन नियुक्त किया गया और उसे वहीं रहने की अनुमति भी दी गई। शिकायतकर्ताओं ने इसे नियमों के विपरीत और संदिग्ध आचरण बताया था।

बिना लाइसेंस वाहन चलाने का आरोप
आउटसोर्स कर्मचारी विनोद रावत पर भी सवाल उठे थे। शिकायत में कहा गया था कि उन्हें कॉलेज के वाहनों पर चालक के रूप में ड्यूटी दी गई, जबकि उनके पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस तक नहीं था।

कार्रवाई नहीं होने से उठ रहे सवाल
मेडिकल कॉलेज से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि इतने गंभीर आरोपों के बाद भी जांच शुरू नहीं हो रही, तो इससे पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मामला जानबूझकर लंबित रखा जा रहा है। वहीं अब सभी की नजरें भोपाल संचालनालय पर टिकी हैं कि आखिर जांच कब शुरू होगी और आरोपों की सच्चाई सामने आएगी या नहीं।

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