सुपर मॉम ज्वाला और गामिनी चीता ने बच्चों की परवरिश के लिए चुना आसान रास्ता,पढिए शिकार की ऑडिट

vikas
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भोपाल।
शिवपुरी-श्योपुर जिले की सीमा पर स्थित कूनो नेशनल पार्क मे बसाए गए दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया के चीते अब पूरी तरह कूनो नेशनल पार्क और उसके समीप वाले जिलो की पर्यावरण मे ढल चुके है। हवा,पानी और वातावरण के साथ साथ चीतो के शिकार करने का तरीका भी बदल गया है। चीतो ने अब शिकार के लिए आसान रास्ता भी चुन लिया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सितंबर 2024 से दिसंबर 2025 तक की प्रोजेक्ट चीता प्रोग्रेस रिपोर्ट ने यह चौंकाने वाला खुलासा किया है,इस रिपोर्ट में चीतो के शिकार की ऑडिट रिपोर्ट पेश की है। 

पालतू पशु आसान शिकार,संघर्ष का कारण भी बन सकता है
रिपोर्ट के अनुसार खुले जंगल में विचरण कर रहे चीतों के कुल शिकार में अब 50 प्रतिशत हिस्सा पालतू पशुओं का हो चुका है। इनमें 30 प्रतिशत घरेलू बकरियां और 20 प्रतिशत मवेशी शामिल हैं। वहीं 42 प्रतिशत शिकार अभी भी चीतल का है, जबकि शेष 8 प्रतिशत अन्य वन्यजीव हैं,इस रिपोर्ट पर जाए तो चीते आसान शिकार अर्थात पालतू दुधारू पशुओं को अपनी भोजन का 50 प्रतिशत रूप में उपयोग कर रहे है यह रिपोर्ट इस बात को लेकर चिंतित करती है कि आगे यह पालतू पशु का शिकार का चीता का व्यवहार मानव और चीता के संघर्ष का प्रमुख कारण बन सकती हैं। 

विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव किसी संकट या असामान्य व्यवहार का संकेत नहीं है, बल्कि चीतों की पारिस्थितिक अनुकूलन क्षमता का उदाहरण है। जब चीते जंगल की सीमा से बाहर निकलकर वन क्षेत्रों और गांवों के आसपास पहुंचते हैं तो उन्हें बकरियां और मवेशी अपेक्षाकृत आसान शिकार के रूप में मिलते हैं। इनका शिकार करने में कम ऊर्जा खर्च होती है और जोखिम भी कम रहता है, इसलिए उन्होंने इन्हें अपने भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना लिया है।

ज्वाला और गामिनी रहीं सबसे सफल शिकारी
रिपोर्ट में बताया गया है कि शावकों के साथ घूम रही मादा चीतों ज्वाला और गामिनी ने सबसे अधिक शिकार किए। विशेषज्ञों के अनुसार शावकों की परवरिश और उन्हें दूध पिलाने के लिए मादा चीतों को अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसी वजह से उन्होंने ऐसे शिकार चुने जिन्हें पकड़ना आसान था।

ज्वाला और उसके शावकों ने खुले जंगल में छोड़े जाने के बाद अपने कुल शिकार में करीब 40 प्रतिशत घरेलू बकरियों को निशाना बनाया। वहीं नर चीते अग्नि और वायु ने अपेक्षाकृत अधिक चीतल (39 प्रतिशत) और मवेशियों (26 प्रतिशत) का शिकार किया।

12 जिलों तक पहुंच चुके हैं चीते
प्रोजेक्ट चीता की रिपोर्ट बताती है कि कूनो के चीते अब केवल राष्ट्रीय उद्यान तक सीमित नहीं रहे। रेडियो कॉलर से हुई निगरानी में पता चला है कि वे मध्यप्रदेश और राजस्थान के 12 जिलों तक विचरण कर चुके हैं। हाल ही में नर चीता अग्नि रणथंभौर टाइगर रिजर्व तक पहुंच गया था, जिसे वन विभाग ने ट्रैंक्यूलाइज कर सुरक्षित वापस कूनो लाया।

100 से ज्यादा बार करना पड़ा रेस्क्यू और ट्रैंक्युलाइजेशन
रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दो वर्षों में चीतों की मॉनिटरिंग, स्वास्थ्य परीक्षण, स्थानांतरण और रेस्क्यू के लिए 100 से अधिक बार उन्हें ट्रैंक्यूलाइज किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि वन विभाग लगातार उनकी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष कम हो और चीतों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

प्रोजेक्ट चीता की यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में पुनर्वासित चीते अब धीरे-धीरे स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपना व्यवहार बदल रहे हैं। हालांकि गांवों के आसपास पालतू पशुओं का बढ़ता शिकार वन विभाग के लिए नई चुनौती भी बन सकता है, क्योंकि इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका बढ़ने की संभावना है।

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