शिवपुरी। आज के समय में जहां लोग कुछ सौ किलोमीटर की यात्रा भी कार, ट्रेन या हवाई जहाज से करना पसंद करते हैं, वहीं एक 71 वर्षीय संत पिछले 52 वर्षों से हर साल करीब 1500 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर मां वैष्णो देवी के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं। न बढ़ती उम्र, न मौसम की मार और न ही लंबा रास्ता उनके संकल्प को डिगा सका। उनकी यह तपस्या और अटूट श्रद्धा हर किसी को प्रेरित करती है।
सोमवार को शिवपुरी जिले और ग्राम सतनवाड़ा के बीच स्थित खूबत घाटी के पास मां वैष्णो देवी धाम की पैदल यात्रा पर निकले संत श्री श्री 108 मंगलनाथ महाराज से शिवपुरी समाचार डॉट कॉम के रिपोर्टर राजेन्द्र बाथम की मुलाकात हुई। बातचीत के दौरान रिपोर्टर ने संत के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया और उनकी वर्षों की साधना और आस्था से जुड़ी प्रेरणादायक यात्रा को जाना।
राजगढ़ के आश्रम से शुरू होती है हर वर्ष की तपस्या
संत श्री श्री 108 मंगलनाथ ने बताया कि उनका निवास मध्य प्रदेश के राजगढ़ (ब्यावरा) जिले स्थित दादागुरु बालकनाथ आश्रम में है, जहां वे वर्षों से साधना, धूनी और जप-तप में लीन रहते हैं। वर्तमान में उनकी आयु 71 वर्ष है, लेकिन उनकी दिनचर्या आज भी एक तपस्वी की तरह अनुशासित है।
19 वर्ष की उम्र में लिया था संकल्प
संत ने बताया कि उन्होंने महज 19 वर्ष की आयु में मां वैष्णो देवी धाम की पैदल यात्रा का संकल्प लिया था। तब से लेकर आज तक लगातार 52 वर्षों में ऐसा एक भी वर्ष नहीं आया, जब उन्होंने यह यात्रा छोड़ी हो। हर वर्ष वे कटरा (जम्मू-कश्मीर) स्थित मां वैष्णो देवी धाम तक पैदल पहुंचकर माता के दरबार में शीश नवाते हैं।
हर साल 1500 किलोमीटर का कठिन सफर
संत मंगलनाथ के अनुसार, एक यात्रा में उन्हें लगभग 1500 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। यह सफर कई राज्यों, गांवों और शहरों से होकर गुजरता है। रास्ते में मौसम की मार, बारिश, तेज धूप, ठंड, थकान और अन्य कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, लेकिन उनकी श्रद्धा इन सभी चुनौतियों पर भारी पड़ती है। उन्होंने कहा कि यह यात्रा किसी मनोकामना, प्रसिद्धि या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं होती, बल्कि केवल मां वैष्णो देवी के प्रति अटूट श्रद्धा, विश्वास और भक्ति का प्रतीक है।
लोगों के लिए बन रहे प्रेरणा स्रोत
खूबत घाटी में संत को देखकर स्थानीय लोग भी भाव-विभोर हो गए। अनेक लोगों ने उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और उनकी इस अनूठी तपस्या की सराहना की। लोगों का कहना था कि जिस उम्र में अधिकांश लोग लंबी दूरी चलने से भी कतराते हैं, उस उम्र में संत का हर वर्ष हजारों किलोमीटर पैदल चलना असाधारण आध्यात्मिक शक्ति और दृढ़ संकल्प का परिचायक है।
भक्ति का संदेश
संत श्री श्री 108 मंगलनाथ की यह यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन, त्याग और आत्मविश्वास का जीवंत उदाहरण है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि यदि श्रद्धा सच्ची हो तो उम्र, दूरी और कठिनाइयां भी इंसान के संकल्प को नहीं रोक सकतीं।** ऐसे संत समाज को यह प्रेरणा देते हैं कि ईश्वर के प्रति समर्पण केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्म, तपस्या और निरंतरता से सिद्ध होता है।

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