कोलारस मे जंगल राज,रेत के लिए सिंध नदी को सूखा रहे है माफिया,प्रशासन बेवस

vikas
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शिवपुरी। शिवपुरी जिले की कोलारस विधानसभा मे जंगलराज चल रहा है। कोलारस विधानसभा मे माफियाओ के हौसले इतने बुलंद है कि रेत के अवैध उत्खन्नन के लिए जीवन दायिनी सिंध नदी को ही सूखा रहे है। प्रशासन इतना बेवस है कि मीडिया के फोन तक नही उठा रहा है और जबाव देने से बच रहे है। 

मामला सिंध नदी पर बने स्टॉप डेम को तोडने और उनके गेट खोलने का,शिवपुरी के पत्रकार देवेन्द्र समाधिया ने इस मामले को लेकर जल संसाधन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी को कॉल किया तो फोन रिसीव नही हुआ,इसके बाद पत्रकार समाधिया ने एक मैसैस लिखा ओर अधिकारी महोदय को भेज दिया,इस मैसेस मे स्पष्ट लिखा है कि आप कॉल नही उठा रहे है अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे है और इस मैसेस का स्क्रीन शॉट वायरल भी कर दिया। कुल मिलाकर कहने का सीधा अर्थ है कि कौनसी ताकत है जो अधिकारियो को इतना बेवस कर दिया है,कार्यवाही तो छोडे कॉल तक रिसीव नही कर पा रहे हैं।  

कोलारस विधानसभा मे अवैध रेत खनन को आसान बनाने के लिए पिछले डेढ़ महीने में चार बार अलग-अलग घाटों पर बने स्टॉप डेम के गेट खोलकर नदी का पानी बहा दिया गया। हैरानी की बात यह है कि पानी बहने की शिकायतें लगातार मिलने के बावजूद जल संसाधन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई तो दूर, ग्रामीणों के फोन तक उठाना जरूरी नहीं समझ रहे हैं।स्थिति यह है कि आरी और लिलवारा घाट पर बने स्टॉप डेमों के गेट पिछले पांच दिनों से खुले पड़े हैं और हजारों लीटर पानी लगातार बह रहा है। नदी का जलस्तर तेजी से घट रहा है, जबकि गर्मी के इस दौर में यही पानी आने वाले महीनों में ग्रामीणों और पशुओं की प्यास बुझाने का सहारा बन सकता था।

पहले पानी बहाया, फिर रेत निकालने की तैयारी
ग्रामीणों का आरोप है कि नदी में पानी भरा रहने से रेत निकालना मुश्किल होता है। ऐसे में रेत माफिया पहले स्टॉप डेम के गेट खुलवाकर पानी खाली करवाते हैं और फिर नदी के सूखते ही अवैध खनन शुरू कर देते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह पूरा खेल बिना विभागीय मिलीभगत के संभव नहीं है। लिलवारा घाट पर पानी खाली होने के बाद नदी की तलहटी में रेत साफ दिखाई देने लगी है। इससे ग्रामीणों की आशंका और मजबूत हो गई है कि पानी बहाने का मकसद केवल अवैध खनन के लिए रास्ता साफ करना है।

डेढ़ महीने में चार बार दोहराया गया खेल
ग्रामीणों के अनुसार यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले डेढ़ महीने में चार बार स्टॉप डेम के गेट खोले जा चुके हैं। 22-23 अप्रैल की रात सढ़बूढ़ घाट के गेट तोड़ दिए गए और पूरा पानी बह गया। 17-18 मई की रात एक बार फिर उसी घाट के गेट खोल दिए गए। 4-5 जून की रात* आरी स्थित स्टॉप डेम के गेट खोल दिए गए, जो पांच दिन बाद भी बंद नहीं हुए। 5-6 जून की रात लिलवारा घाट के गेट भी खोल दिए गए और वहां से भी लगातार पानी बह रहा है। दो बार तो ग्रामीणों ने बदरवास तहसीलदार को सूचना देकर गेट बंद कराए, लेकिन इस बार अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी है।

जिम्मेदारों की चुप्पी पर उठे सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि जल संसाधन विभाग के अधिकारियों को बार-बार सूचना दी गई, लेकिन उन्होंने फोन तक नहीं उठाए। विभाग के कार्यपालन यंत्री (ईई) को भी कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसी चुप्पी ने अब विभाग की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीण खुलकर आरोप लगा रहे हैं कि रेत माफियाओं और विभागीय अधिकारियों के बीच सांठगांठ के कारण ही गेट खुलने के बाद उन्हें बंद करने में रुचि नहीं दिखाई जा रही।

पहले भी हो चुका है ऐसा खेल
ग्रामीण बताते हैं कि कुछ वर्ष पहले टामकी क्षेत्र में भी सिंध नदी पर बने स्टॉप डेम के गेट रातों-रात तोड़ दिए गए थे। उस समय भी नदी का पानी बह जाने के बाद बड़े पैमाने पर रेत का अवैध खनन हुआ था। मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन आज तक किसी आरोपी का पता नहीं चल सका।

जल संकट का बढ़ रहा खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि स्टॉप डेमों का निर्माण नदी के पानी को संरक्षित करने, भूजल स्तर बनाए रखने और गर्मी के दिनों में जल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है। यदि इसी तरह लगातार पानी बहाया जाता रहा तो आने वाले दिनों में सिंध नदी किनारे बसे गांवों में जल संकट गहरा सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सिंध नदी का पानी बहाने वालों पर कार्रवाई कब होगी और क्या जल संसाधन विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए इन गेटों की निगरानी करेगा, या फिर रेत माफियाओं के सामने नदी का पानी यूं ही बहता रहेगा? 

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