शिवपुरी। स्मैक तस्करी के एक आरोपी के साथ पुलिस हिरासत में कथित मारपीट और अमानवीय व्यवहार का मामला सामने आने के बाद न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया है। करैरा थाने के लॉकअप में आरोपी के साथ मारपीट किए जाने और उसके मुंह में जूता ठूंसने जैसे गंभीर आरोपों पर विशेष न्यायाधीश, एनडीपीएस एक्ट ने स्वसंज्ञान लेते हुए संबंधित एसआई और एक अन्य पुलिसकर्मी के खिलाफ परिवाद दर्ज कराने के आदेश दिए हैं।
यह मामला करैरा थाना क्षेत्र का है, जहां पुलिस ने स्मैक तस्करी के आरोप में गुना जिले के राघौगढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम आनंदपुर मोडया निवासी 31 वर्षीय रामहेत मीणा पुत्र रामसिंह मीणा को गिरफ्तार किया था। आरोपी को पूछताछ के लिए विशेष न्यायालय से एक दिन की पुलिस रिमांड पर लिया गया था।
कोर्ट पहुंचा तो जख्मी दिखा आरोपी
पुलिस रिमांड पूरी होने के बाद जब आरोपी रामहेत मीणा को दोबारा विशेष न्यायाधीश, एनडीपीएस एक्ट की अदालत में पेश किया गया, तब वह घायल अवस्था में दिखाई दिया। न्यायालय ने जब उससे चोटों के संबंध में पूछा, तो आरोपी ने लॉकअप में हुई कथित प्रताड़ना की पूरी कहानी बताई।
रामहेत ने अदालत को बताया कि 22 मई की शाम करीब 6 से 7 बजे के बीच करैरा थाने के लॉकअप में उसके साथ मारपीट की गई। आरोपी के अनुसार एक मोटे पुलिसकर्मी ने उसे लात-घूंसों से पीटा और उसके मुंह में जूता डाल दिया, जिससे उसके मुंह और शरीर पर चोटें आईं।
10 दिन और रिमांड लूंगा
आरोपी ने अदालत में यह भी आरोप लगाया कि एसआई राधेश्याम शिवहरे उसे लगातार धमका रहे थे। आरोपी के मुताबिक एसआई ने कहा कि “मैं तुम्हारी 10 दिन की और पुलिस रिमांड लूंगा, उसके बाद जेल भेजेंगे। आरोपी के बयान और उसके शरीर पर दिखाई दे रही चोटों को गंभीरता से लेते हुए विशेष न्यायाधीश दिनेश कुमार शर्मा ने तत्काल मामले में संज्ञान लिया।
न्यायालय ने दिए परिवाद दर्ज करने के आदेश
विशेष न्यायाधीश, एनडीपीएस एक्ट, शिवपुरी ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया मामला गंभीर प्रतीत होता है। न्यायालय ने करैरा थाने के एसआई राधेश्याम शिवहरे और एक अज्ञात पुलिसकर्मी के खिलाफ परिवाद दर्ज किए जाने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही यह परिवाद आगे की कार्रवाई के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, करैरा भूपेंद्र सिंह यादव की अदालत में भेजने के आदेश भी दिए गए हैं।
पुलिस कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद पुलिस हिरासत में आरोपियों के साथ व्यवहार को लेकर फिर सवाल खड़े हो गए हैं। अदालत द्वारा सीधे स्वसंज्ञान लेना यह दर्शाता है कि न्यायपालिका हिरासत में मानवाधिकार उल्लंघन जैसे मामलों को गंभीरता से देख रही है। अब देखना यह होगा कि परिवाद दर्ज होने के बाद मामले में क्या जांच होती है और संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ क्या कार्रवाई सामने आती है।

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