शिवपुरी। आज प्रतिवर्ष रावण का पुतला दहन किया जाता है। पौराणिक कथा है कि सीता का अपहरण कर रावण ने जो पाप किया था उसकी सजा उसे भगवान राम ने दी, लेकिन रावण भी कमजोर नहीं था। रावण शब्द में आज भी पावर है और यदि शरीर के किसी अंग पर झुनझुनी हो रही हो और हम उसे पकड़कर दस-पन्द्रह बार रावण रावण कहें तो वह झुनझुनी खत्म हो जाती है।
जिस रावण का पुतला प्रतिवर्ष जलाया जाता है उसकी बजाय यदि हम अपने अंदर के पापों का दहन करें तो ही यह दशहरा पर्व सार्थक होगा।
रावण तो चारों वेदों का ज्ञाता था और उसने एक छोटा पाप किया जिसकी उसको इतनी बड़ी सजा मिली कि प्रतिवर्ष उसका पुतला जलाया जा रहा है।
हम तो प्रतिदिन न जाने कितने-कितने पाप करते हैं सोचो हमारा क्या होगा? जैन शास्त्रों में तो रावण आने वाले भव का 24 वां तीर्थंकर होगा इसलिए जैन दर्शन के अनुसार हमें न तो रावण के पुतले को जलते देखना चाहिए न ही दहन करना चाहिए। पूर्व कथा है कि रावण ही एक ऐसा कला का प्रेमी था कि जब मंदोदरी नृत्य कर रही थी और रावण वीणा बजा रहा था तभी वीणा का तार टूट गया उस समय मंदोदरी के नृत्य पर कोई असर न पड़ेे इसके लिए रावण ने अपने शरीर की नस निकालकर वीणा के तार के साथ बांध दी और लगातार वीणा बजाता रहा।
उक्त प्रवचन आज दशहरा पर्व के अवसर पर साध्वी शुभंकराश्रीजी म.सा. ने जैन श्वेता बर मंदिर पर दिये। साध्वी जी ने कहा कि बुराई पर अच्छाई का प्रतीक माना जाता है तो हमें रावण के पुतले का शरीर न बढ़ाकर हमारे भीतर के अहम्, पाप और बुराई को कम करना चाहिए।


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