शिवपुरी। शिवपुरी की 111 करोड़ रुपए की सीवरेज और एसटीपी परियोजना में कथित वित्तीय बर्बादी का मामला अब और गंभीर हो गया है। ग्वालियर हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान अपर मुख्य सचिव (शहरी विकास एवं आवास) संजय दुबे के रुख पर आश्चर्य जताते हुए साफ कहा कि इतनी बड़ी परियोजना की विफलता की जिम्मेदारी तय करने से कोई बच नहीं सकता। कोर्ट ने दो माह के भीतर तकनीकी जांच कर दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने वाली विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं
शिवपुरी शहर की बहुचर्चित 111 करोड़ रुपए की सीवरेज और एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) परियोजना में कथित अनियमितताओं और भारी वित्तीय नुकसान के मामले में सोमवार को ग्वालियर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने अपर मुख्य सचिव (शहरी विकास एवं आवास) संजय दुबे द्वारा प्रस्तुत आवेदन पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है मानो वे परियोजना की प्रारंभिक जांच से भी स्वयं को अलग रखना चाहते हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट सवाल किया कि जब 9.28 करोड़ रुपए के प्रस्ताव से जुड़े मामले की जांच में कोई दिक्कत नहीं थी, तो फिर 111 करोड़ रुपए की परियोजना की विफलता और बर्बादी की जिम्मेदारी तय करने से परहेज क्यों किया जा रहा है। अदालत की इस टिप्पणी ने पूरे मामले को नई गंभीरता दे दी।
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने अदालत को बताया कि यदि हाईकोर्ट चाहे तो एसीएस संजय दुबे स्वयं प्रारंभिक जांच करेंगे। आवश्यकता पड़ने पर लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) विभाग से अलग स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों की टीम की भी सहायता ली जाएगी। इस आश्वासन के बाद हाईकोर्ट ने अपने 13 जुलाई के आदेश में संशोधन करते हुए जांच की अनुमति प्रदान कर दी।
अदालत ने निर्देश दिए कि परियोजना स्थल का निरीक्षण कर दो माह के भीतर तकनीकी परीक्षण कराया जाए तथा यह स्पष्ट किया जाए कि परियोजना के अधूरा रहने और विफल होने के लिए कौन-कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं। विस्तृत रिपोर्ट में संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि जांच टीम का कोई सदस्य प्रथम दृष्टया इस मामले में संलिप्त पाया जाता है, तो उसे तत्काल जांच दल से अलग किया जाएगा। साथ ही एसीएस संजय दुबे को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने से भी छूट प्रदान कर दी गई।
हरिओम को हाईकोर्ट की सख्त चेतावनी
माधव टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर हरिओम को भी हाईकोर्ट ने कड़ी चेतावनी दी। अदालत ने कहा कि सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर उनकी हिचकिचाहट पहले भी सामने आ चुकी है। यदि इस जांच के दौरान किसी अधिकारी को बचाने की कोशिश की गई, तो उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी हरिओम की मानी जाएगी।
कोर्ट ने शुभम अग्रवाल, यशवंत राठौर, एस.एल. बाथम, वी.के. छारी और ईशान धाकड़ के खिलाफ वन विभाग को निष्पक्ष जांच और आवश्यक कानूनी कार्रवाई जारी रखने के निर्देश भी दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को निर्धारित की गई है।
अल्का उपाध्याय पर 20 हजार रुपए की कॉस्ट
मामले में तत्कालीन ईपीसीओ की कार्यकारी संचालक रहीं अल्का उपाध्याय के जवाब से भी हाईकोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि उन्होंने परियोजना तैयार करने वाले अधिकारियों का तो उल्लेख किया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि अधूरी डीपीआर को अंतिम स्वीकृति और हस्ताक्षर उनके द्वारा किए गए थे या नहीं। कोर्ट ने उनके जवाब को टालमटोल वाला बताते हुए दो सप्ताह के भीतर बिंदुवार स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए और 20 हजार रुपए की कॉस्ट भी लगाई।
अब दो माह में आने वाली जांच रिपोर्ट पर सभी की नजरें टिकी हैं। यदि जांच में परियोजना की विफलता और 111 करोड़ रुपए की कथित बर्बादी के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होती है, तो इस मामले में बड़े प्रशासनिक और कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।
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