शिवपुरी, हाईकोर्ट ने वन्य विभाग से पूछा सांख्य सागर झील के प्रदुषण मे FIR क्यो नही कराई

vikas
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शिवपुरी।
माधव नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाने वाली सांख्य सागर झील में सीवर और गंदे पानी के प्रवाह के मामले में हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने वन विभाग और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई अवैध कार्य यदि वर्षों से जारी है, तो मात्र समय बीत जाने से वह वैध नहीं हो जाता।

सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिए कि मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जा सकती है और यदि लापरवाही या दोष साबित होता है तो जिम्मेदार अधिकारियों एवं एजेंसियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश भी दिए जा सकते हैं।

झील में पहुंच रहा शहर का सीवर
शिवपुरी निवासी आदित्य राज पांडे द्वारा दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि शहर के कई नालों और सीवरेज का गंदा पानी लगातार सांख्य सागर झील में छोड़ा जा रहा है। यह झील माधव नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व क्षेत्र के वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत मानी जाती है। याचिका में कहा गया कि झील में प्रदूषित पानी पहुंचने से न केवल पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित हो रहा है, बल्कि वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि किसी संरक्षित जल स्रोत में सीवर का पानी मिलना अत्यंत गंभीर विषय है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। मामले की अगली सुनवाई बुधवार को निर्धारित की गई है।

वन विभाग की दलील पर कोर्ट की नाराजगी
सुनवाई के दौरान माधव नेशनल पार्क के उप संचालक हरिओम व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि पिछले करीब 25 वर्षों से झील में वेस्ट मटेरियल और गंदा पानी पहुंच रहा है, इसलिए इसमें किसी की दुर्भावनापूर्ण मंशा नहीं मानी जानी चाहिए।

इस दलील पर डबल बेंच ने कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई गैरकानूनी कार्य लंबे समय से जारी है, तो उससे उसकी वैधता सिद्ध नहीं होती। अदालत ने यह भी पूछा कि बिना किसी स्वतंत्र और वैज्ञानिक जांच के वन विभाग ने प्रदूषण फैलाने वाली एजेंसियों को किस आधार पर क्लीन चिट दे दी।

वन्यजीवों के लिए सुरक्षित पानी बताने पर मांगा वैज्ञानिक प्रमाण
वन विभाग की ओर से यह भी कहा गया कि झील का पानी ‘डी श्रेणी’ का है और उसमें मानव मल एवं अन्य अपशिष्ट मिलने के बावजूद वह वन्यजीवों के उपयोग के लिए उपयुक्त माना जा सकता है।

इस तर्क पर कोर्ट ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। अदालत ने पूछा कि इंसानी मल, बैक्टीरिया और अन्य प्रदूषकों से युक्त पानी को वन्यजीवों के लिए सुरक्षित कैसे माना जा सकता है। कोर्ट ने विभाग से इस दावे के समर्थन में वैज्ञानिक अध्ययन और प्रमाण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि जब झील की स्थिति इतनी गंभीर बताई जा रही है, तब वन विभाग ने अब तक पानी की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं कराई।

पीएचई विभाग भी कोर्ट के निशाने पर
सुनवाई के दौरान पीएचई विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हुए। अदालत के समक्ष जानकारी रखी गई कि करोड़ों रुपये की लागत से शहर में सीवरेज लाइन परियोजना शुरू की गई थी, लेकिन इसके क्रियान्वयन में नगर पालिका के साथ अपेक्षित समन्वय नहीं हो सका।

याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि बड़ी संख्या में घर आज भी सीवरेज नेटवर्क से नहीं जुड़े हैं, जिसके कारण गंदे पानी के निस्तारण की समस्या बनी हुई है और परियोजना का उद्देश्य पूरी तरह सफल नहीं हो पाया।

एफआईआर और कानूनी कार्रवाई की संभावना
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व क्षेत्र से जुड़े जल स्रोतों को प्रदूषित करना तथा प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाना वन्यजीव संरक्षण कानूनों के तहत गंभीर अपराध माना जा सकता है।

अदालत ने यह भी पूछा कि जब वर्षों से झील में प्रदूषण फैल रहा था, तब वन विभाग ने जिम्मेदार अधिकारियों, विभागों या एजेंसियों के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज क्यों नहीं कराया। कोर्ट के सख्त रुख से माना जा रहा है कि आगामी सुनवाई में जिम्मेदार पक्षों की जवाबदेही तय करने, विस्तृत जांच कराने और आवश्यक कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए जा सकते हैं। सांख्य सागर झील से जुड़े इस मामले ने अब पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। आने वाली सुनवाई पर पूरे जिले की निगाहें टिकी हुई हैं।

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