एफआर न होने पर बीमा दावे को रोका जाना गलत: उपभोक्ता फोरम

Updesh Awasthee
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शिवपुरी। उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष एके वर्मा और सदस्य श्रीमती अंजू गुप्ता ने एक फैंसले में कहा है कि अनावेदक न्यू इण्डिया इश्योरेंश कंपनी ने एफआर की मांग कर दावे का निराकरण न कर स्पष्ट रूप से सेवा में कमी की है। 

फैंसले में कहा गया है कि बीमा संविदा का पालन इसकी अपनी शर्तों एवं स्वयं इसमें वर्णित शब्दों के आधार पर किया जाना चाहिये। इसमें किसी नए शब्द को जोड़ा अथवा घटना नहीं चाहिये। जहां तक एफआर का सवाल है तो चोरी के मामले में रिपोर्ट किये जाने के पश्चात पुलिस द्वारा ल बे समय तक विवेचना की जाती है। 

ताकि जहां तक संभव हो चोरी करने वाले व्यक्ति के विरूद्ध न्यायालय में समुचित कार्यवाही की जा सके एवं चोरी की गई बस्तु की बरामदगी की जा सके। लेकिन इस मामले में बीमा कंपनी ने एफआर की मांग कर दावे का निराकरण नहीं किया और सेवा में कमी की है।

इस मामले में उपभोक्ता मुरारीलाल गुप्ता पुत्र गोविन्दराम गुप्ता निवासी शिवपुरी ने उपभोक्ता न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करते हुए कहाकि वह मोटरसाइकिल क्रमांक एमपी 33 बी 9239 का रजिस्टर्ड स्वामी है। जिसका बीमा उसने न्यू इंडिया इंश्योरेंश कंपनी से कराया है। उसका उक्त वाहन दिनांक 30.9.11 को कालीमाता मंदिर के पास से चोरी चला गया। 

जिसकी रिपोर्ट उसने देहात थाना पुलिस में की और तुरंत इसकी सूचना अनावेदक बीमा कंपनी को दी। उसने समस्त दस्तावेज व क्लेम फोरम भरकर बीमा कंपनी को दिये और बीमा कंपनी ने सात दिवस में क्लेम भुगतान का आश्वासन दिया। 

लेकिन दिनांक 25 मार्च 2012 को बीमा कंपनी ने पत्र द्वारा इनवाईस की मूल प्रति एवं फाईनल रिपोर्ट पेश करने पर ही दावा प्रतिक्रिया को आगे बढ़ाने को कहा था। जबकि वाहन के इन वाईस की मूल प्रति आरटीओ कार्यालय में जमा कराई जाती है। जो आवेदक के आधिपत्य में नहीं है। जिसके कारण उसके क्लेम का भुगतान नहीं किया गया।

 बीमा कंपनी के वरिष्ठ मंडल प्रबंधक वाईबी सिंह ने फोरम में शपथ पत्र प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने कहा कि आवेदक को पत्र लिखकर इन बाईस की मूल प्रति, सीजेएम से स्वीकृत फाईनल रिपोर्ट एवं आवेदक के ड्राईबिंग लायसेंस की छायाप्रति प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था।, लेकिन उसने एफआर की प्रमाणित प्रतिलिपि आज तक पेश नहीं की।

 इसी कारण उसके बीमा दावे का निराकरण नहीं किया गया है। न्यायालय में पक्ष एवं विपक्ष की बहस सुनने के बाद आदेश दिया कि बीमा कंपनी द्वारा आवेदक मुरारीलाल गुप्ता के वाहन का मूल्य बीमा दिनांक 10.2.2011 को 16 हजार रूपए दर्शाया गया है। बीमा होने के लगभग सात माह बाद उक्त वाहन चोरी गया। 

ऐसी दशा में स्वीकृत मूल्य से दस प्रतिशत राशि का अवमूल्यन कर आवेदक को बीमा कंपनी से 14400 रूपए दिलाया जाना उचित प्रतीत होता है। बीमा कंपनी द्वारा दावे का निराकरण न करने से आवेदक को हुई मानसिक एवं आर्थिक क्षति के प्रतिकर स्वरूप ढाई हजार रूपए और अभिभाषक शुल्क सहित प्रकरण व्यय के रूप में दो हजार रूपए दिलाया जाना उचित प्रतीत होता है। 

इस तरह से बीमा कंपनी दो माह में उक्त संपूर्ण राशि 18 हजार 900 रूपए आवेदक मुरारीलाल को अदा करें। चूक होने पर आदेश दिनांक से राशि का भुगतान होने तक आवेदक 9 प्रतिशत वार्षिक व्याज की दर से साधारण व्याज प्राप्त करने का भी अधिकारी होगा। 

क्या होती है फाईनल रिपोर्ट या एफआर
अधिकतर मामलों में एफआर न मिलने के कारण बीमा दावों का निराकरण नहीं किया जाता और इसे हथियार के रूप में बीमा कंपनी उपयोग करती है। अपराध होने पर पुलिस में पहले उसकी एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज की जाती है और जब अपराध का निराकरण नहीं होता और अपराधी गिर तार नहीं होता तो पुलिस द्वारा एफआर जिसे फायनल रिपोर्ट या खात्मा रिपोर्ट लगा दी जाती है। जिससे यह फाईल बंद हो जाती है। 

फाईनल रिपोर्ट पर टीआई से लेकर एसडीओपी और एसपी के हस्ताक्षर होते हैं और फिर उसे सीजेएम (मु य न्यायिक मजिस्ट्रेट) के पास भेजा जाता है और संतुष्ठ होने पर वह हस्ताक्षर करते हैं तब एफआईआर दर्ज करने वाले को खात्मा रिपोर्ट या एफआर मिलती है। जिसे प्राप्त करना आसान नहीं होता है और इसका ही फायदा बीमा कंपनियां उठाती है। इस संदर्भ में उपभोक्ता फोरम शिवपुरी का यह निर्णय उपभोक्ता हित में राहत देने वाला निर्णय माना जा सकता है।

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