शिवपुरी। शहर के झांसी तिराहे स्थित गांधी पेट्रोल पंप की जमीन को मुक्त कराने पहुंचीं नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा को सोमवार को बैरंग लौटना पड़ा। सुबह करीब 11:20 बजे से दोपहर एक बजे तक चले इस घटनाक्रम पर लोगों और सोशल मीडिया की निगाहें टिकी रहीं। नपाध्यक्ष जेसीबी लेकर जमीन खाली कराने पहुंचीं, लेकिन मौके पर पुलिस और प्रशासनिक अमला मौजूद नहीं था। पेट्रोल पंप कर्मचारियों के जेसीबी के सामने लेट जाने के बाद कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी और आखिरकार नगर पालिका की जेसीबी को वापस लौटना पड़ा।
इस दौरान नपाध्यक्ष ने स्पष्ट कहा कि वह पेट्रोल पंप की जमीन को मुक्त कराने के लिए पीछे नहीं हटेंगी। उन्होंने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो पेट्रोल पंप के सामने टेंट लगाकर धरना देंगी। दूसरी ओर पेट्रोल पंप संचालक समीर गांधी ने पूरी कार्रवाई को अवैधानिक बताते हुए इसे दबाव बनाने की कोशिश करार दिया। मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है और 6 अक्टूबर को इसकी सुनवाई की तारीख लगी है।
एक दिन पहले प्रेस वार्ता में सीएमओ पर लगाए थे गंभीर आरोप
एक दिन पहले नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा ने प्रेस वार्ता कर इस जमीन को लेकर नगर पालिका के सीएमओ यशवंत राठौर पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि सीएमओ ने समय रहते जमीन खाली नहीं कराई, जिसके कारण पेट्रोल पंप संचालक को सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए पर्याप्त समय मिल गया। नपाध्यक्ष ने आरोप लगाया था कि सीएमओ ने जानबूझकर 10 दिन का नोटिस दिया, जबकि नियमानुसार 15 दिन का नोटिस दिया जाना चाहिए था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि नगर पालिका की जमीन का दो करोड़ रुपए से अधिक किराया बकाया है, लेकिन नोटिस में किराया वसूली का उल्लेख नहीं किया गया।
गायत्री शर्मा का आरोप था कि कार्रवाई में हुई देरी के कारण मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। उन्होंने कहा था कि अभी भी जमीन खाली कराने के लिए एक दिन का समय है, क्योंकि मामले में 6 अक्टूबर की तारीख लगी है।
आदेश वायरल हुआ तो बढ़ी कार्रवाई की हलचल
प्रेस वार्ता के बाद नगर पालिका का एक आदेश सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इसमें गांधी पेट्रोल पंप की जमीन को मुक्त कराने की कार्रवाई के लिए 5 अक्टूबर की तारीख अंकित थी। आदेश के वायरल होते ही माना जाने लगा कि सोमवार को नगर पालिका का अमला कार्रवाई के लिए पहुंचेगा। सुबह करीब 11:20 बजे नपाध्यक्ष गायत्री शर्मा उपयंत्री खापरे के साथ गांधी पेट्रोल पंप पहुंचीं। उन्होंने उपयंत्री से जेसीबी बुलाने के लिए कहा। कुछ देर बाद नगर पालिका की जेसीबी भी मौके पर पहुंच गई। लेकिन यहां तस्वीर अलग थी। नपाध्यक्ष के साथ न तो सीएमओ मौजूद थे और न ही पुलिस या प्रशासन का कोई बड़ा अमला मौके पर था।
जेसीबी आगे बढ़ी तो कर्मचारी लेट गए सामने
जैसे ही नगर पालिका की जेसीबी पेट्रोल पंप की ओर बढ़ी, वहां काम करने वाले कर्मचारी उसके सामने लेट गए। हालात को देखते हुए जेसीबी चालक ने वाहन रोक दिया। कर्मचारियों को हटाने के लिए मौके पर पुलिस बल या पर्याप्त प्रशासनिक अमला मौजूद नहीं था। स्थिति बिगड़ने की आशंका के बीच जेसीबी ने वापस लौटना शुरू कर दिया। इस तरह जमीन खाली कराने की कार्रवाई मौके पर ही रुक गई।
कोई कोर-कसर नहीं छोड़ूंगी, धरने की चेतावनी
कार्रवाई रुकने के बाद भी नपाध्यक्ष गायत्री शर्मा पीछे हटने के मूड में नहीं दिखीं। उन्होंने कहा कि वह पेट्रोल पंप को हटाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगी। जरूरत पड़ी तो पेट्रोल पंप के सामने टेंट लगाकर धरने पर बैठेंगी। इसके बाद उन्होंने करीब पांच मिनट में वापस आने की बात कही और वहां से चली गईं। हालांकि कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी और अंततः नगर पालिका का अमला वापस लौट गया।
समीर गांधी बोले- नोटिस ही अवैध, टैंक में था एक लाख लीटर पेट्रोल
वहीं पेट्रोल पंप संचालक समीर गांधी ने नगर पालिका की कार्रवाई को अवैधानिक बताया। उनका कहना था कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद नगर पालिका ने जमीन खाली कराने के लिए जो नोटिस दिया था, वह नियमों के अनुरूप नहीं था। उनके अनुसार नियमानुसार तीन नोटिस दिए जाने थे और पेट्रोल पंप खाली करने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए था।
समीर गांधी ने कहा कि सोमवार को पेट्रोल पंप के टैंक में करीब एक लाख लीटर पेट्रोल था। ऐसे में जेसीबी लेकर सीधे कार्रवाई करना गंभीर खतरा पैदा कर सकता था। उन्होंने नगर पालिका की कार्रवाई को नियम विरुद्ध बताते हुए कहा कि मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है और वहां से जो भी फैसला आएगा, उसका सम्मान किया जाएगा।
अब सुप्रीम कोर्ट की तारीख पर टिकी निगाहें
गांधी पेट्रोल पंप की जमीन को लेकर नगर पालिका और पेट्रोल पंप संचालक के बीच विवाद अब न्यायालय तक पहुंच चुका है। एक ओर नगर पालिका अध्यक्ष जमीन को मुक्त कराने की कार्रवाई पर जोर दे रही हैं, वहीं पेट्रोल पंप संचालक कार्रवाई और नोटिस की वैधता पर सवाल उठा रहे हैं।
सोमवार को नगर पालिका की जेसीबी मौके तक पहुंची, लेकिन पुलिस-प्रशासन की पर्याप्त मौजूदगी के अभाव और कर्मचारियों के विरोध के कारण कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी। अब 6 अक्टूबर को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इस पूरे विवाद की अगली दिशा तय कर सकती है।

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