Shivpuri में महुआ के पेड की जड से प्रकट हुई जलधारा महुअर नदी का उदगम, सदियो पुरानी सभ्यता के प्रमाण देती हैं

Lalit Mudgal
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काजल सिकरवार @शिवपुरी। शिवपुरी जिले की खनियाधाना तहसील के मुहासा गावं से महुआ के पेड से निकली एक जलधारा महुअर नदी का रूप ले लिया। वर्तमान मे की बात करे तो यह नदी आधा सैकडा गांवो की जीवन दायिनी है,साथ ही यह महुअर नदी अपने साथ सदियों पुरानी धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को भी समेटे हुए है। आज जहां महुअर नदी आसपास के गांवों के लिए जीवनरेखा बनी हुई है और हजारों किसानों की खेती इसके पानी पर निर्भर है, वहीं इसके किनारे मौजूद प्राचीन मंदिर, मठ, स्तूप, शिलालेख और ऐतिहासिक स्थल इस बात की गवाही देते हैं कि कभी यह पूरा इलाका धर्म, संस्कृति, व्यापार और सत्ता के महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल रहा होगा।

महुअर नदी को पुराने संदर्भों में मधुमती या मधुवेणी के नाम से भी जाना जाता है। यह सिंध नदी की सहचरी मानी जाती है। इसके उद्गम से लेकर सिंध नदी में मिलने तक का क्षेत्र अनेक ऐतिहासिक घटनाओं और पुरातात्विक स्थलों का साक्षी रहा है।

महुआ के पेड़ की जड़ से निकली थी छोटी सी धारा
स्थानीय बुजुर्गों और पुरानी दंत कथाओ के अनुसार मुहासा गांव मे पहले एक विशाल महुआ का पेड़ हुआ करता था। इसी पेड़ की जड़ के पास से पानी की एक छोटी सी धारा निकलती थी। शुरुआत में यह जलधारा इतनी छोटी थी कि शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि आगे चलकर यही एक महत्वपूर्ण नदी का रूप लेगी। समय के साथ यह धारा आगे बढ़ती गई। रास्ते में मिलने वाले छोटे जलस्रोतों और नदियों का पानी इसमें शामिल होता गया और इसका स्वरूप विस्तृत होता गया। आज जिस महुअर नदी को ग्रामीण अपनी जीवनरेखा मानते हैं, उसकी शुरुआत की यह कहानी स्थानीय लोगों के बीच आज भी सुनाई जाती है। महुआ का वह पुराना पेड़ अब वहां नहीं है, लेकिन जिस स्थान से पानी निकलने की बात कही जाती है, वह जगह आज भी स्थानीय लोगों के लिए विशेष आस्था और कौतूहल का केंद्र है।

आज हजारों किसानों की खेती का सहारा
महुअर नदी का महत्व केवल इतिहास तक सीमित नहीं है। वर्तमान में भी यह नदी आसपास के दर्जनों गांवों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। गर्मी के मौसम में जब कई छोटे तालाब और जलस्रोत सूखने लगते हैं, तब भी नदी के कई हिस्सों में पानी ग्रामीणों के काम आता है। महुअर नदी पर बने नावली डैम से आसपास के करीब 26 गांवों के लगभग 22 हजार किसानों को सिंचाई का लाभ मिलने की जानकारी है। करीब 9.5 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई इस जल तंत्र से होती है। ऐसे में महुअर का पानी हजारों परिवारों की खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ा हुआ है।

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महुअर के किनारे सिर्फ गांव नहीं, इतिहास भी बसा है
महुअर नदी के किनारे का भूभाग ऐतिहासिक दृष्टि से भी बेहद समृद्ध रहा है। इसके उद्गम क्षेत्र से लेकर सिंध नदी में संगम तक दोनों किनारों पर मठ, मंदिर, स्तूप और अन्य पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं। पुराने विवरणों में इस पूरे नदी क्षेत्र को विभिन्न पंथों, धर्मों, संप्रदायों और साम्राज्यों के उत्थान-पतन का साक्षी बताया गया है। यानी आज जिस नदी के पानी से खेत सींचे जा रहे हैं, उसी के किनारे कभी धार्मिक गतिविधियों और ज्ञान की परंपराओं के बड़े केंद्र भी विकसित हुए थे।

सातवीं शताब्दी से जुड़े हैं महुआ-तेरही के प्रमाण
महुअर के उद्गम क्षेत्र के आसपास महुआ और तेरही ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं। पुराने उल्लेखों के अनुसार महुआ में सातवीं शताब्दी का शिव मंदिर या शिव मंडिका बताई जाती है। यहां मिले शिलालेख में हर्षवर्धन के समकालीन माने जाने वाले बाणभट्ट के मित्र ईशान भट्ट का उल्लेख होने की बात सामने आती है। तेरही में आठवीं शताब्दी से जुड़ा शिव मंदिर और महिषमर्दिनी मंदिर के सामने स्थित कलात्मक तोरण भी इस क्षेत्र की प्राचीन स्थापत्य कला की समृद्धि को दर्शाते हैं। महुआ-तेरही क्षेत्र में मधुतेय बौद्ध संघ का बड़ा मठ होने का भी उल्लेख मिलता है। यहां गुर्जर प्रतिहार काल से जुड़े शिलालेखों की जानकारी भी मिलती है।

राजपुर में बौद्ध केंद्र की गवाही देता स्तूप
महुआ-तेरही क्षेत्र से आगे बढ़ती महुअर उत्तर दिशा में राजपुर की ओर पहुंचती है। यहां कुठीला मठ और सातवीं शताब्दी से जुड़ा बौद्ध स्तूप इस क्षेत्र के प्राचीन बौद्ध प्रभाव की कहानी बताते हैं।
पुराने विवरणों में हर्षवर्धन के काल में राजपुर को एक समृद्ध बौद्ध केंद्र के रूप में वर्णित किया गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि महुअर नदी का किनारा केवल जल का मार्ग नहीं था, बल्कि कभी विचार, धर्म और संस्कृति के आवागमन का भी महत्वपूर्ण रास्ता रहा होगा।

करारखेड़ा से करैरा तक बदलता रहा महुअर का परिदृश्य
आगे बढ़ने पर महुअर नदी करारखेड़ा क्षेत्र के समीप से गुजरती है। यहां इसके जल प्रवाह में अन्य छोटी नदियां और जलधाराएं भी जुड़ती हैं। इसके बाद नदी पिछोर क्षेत्र को पार करते हुए ऐतिहासिक करैरा दुर्ग के आसपास पहुंचती है। करैरा का इतिहास भी संघर्षों से भरा रहा है। पुराने विवरणों में मालवा के खिलजियों के आक्रमण और यहां हुए भीषण नरसंहार का उल्लेख मिलता है। बाद के समय में वीरसिंह देव ने करैरा दुर्ग का पुनरुद्धार कराया था।

करैरा में महुअर नदी को लेकर एक पुरानी कहावत भी प्रचलित रही है
“कर्रा खेरौ, महुअर नदी।
बेटा करे, बाप से बदी।”
यह कहावत अपने समय में क्षेत्र और नदी के बीच के गहरे संबंध को लोकभाषा में व्यक्त करती थी।

कासना नदी से बनता है महुअर का विस्तार
आगे चलकर कासना नदी महुअर में आकर मिलती है। दिनारा के आसपास धरमो और नंगा नदियों के साथ मिलकर यह क्षेत्र त्रिवेणी संगम का स्वरूप लेता है। इस इलाके से भी अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसी क्षेत्र के एक सिद्ध स्थान पर ओरछा के राजा वीरसिंह जू देव बुंदेला ने तपस्या की थी। कहा जाता है कि वर्ष 1607 में उन्होंने दिनारा के समीप एक विशाल तालाब की नींव रखी थी, जो आज भी उनके समय की याद दिलाता है।

कासना के किनारे भी छिपी है पुरानी सभ्यता
कासना नदी के उद्गम क्षेत्र के पास अम्बारी गांव का भी ऐतिहासिक महत्व बताया जाता है। यहां ईस्वी की पहली शताब्दी तक की ईंटें मिलने का उल्लेख है। इसके अलावा सातवीं शताब्दी की बीस भुजा वाली दुर्गा प्रतिमा को भी इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण पुरातात्विक उपलब्धियों में गिना जाता है।

इतिहास में अम्बारी का उल्लेख विदेशी यात्री इब्नबतूता के यात्रा-विवरण से भी जोड़ा जाता है। बताया जाता है कि ग्वालियर से चंदेरी की यात्रा के दौरान उसने इस क्षेत्र का उल्लेख किया था। समय के साथ अम्बारी का वैभव कम होता गया और यहां के लोग दूसरे स्थानों पर जाकर बसते गए।

व्यापार और बुनाई का भी केंद्र रहा उदगमा
महुअर की ओर बढ़ते हुए कासना नदी के मार्ग में उदगमा बड़ा गांव आता है। पुराने विवरणों के अनुसार यह क्षेत्र परमारों की जागीर रहा था और यहां सूत तथा बुनाई का कारोबार काफी समृद्ध था।

बाद में ग्वालियर में औद्योगिक मिलों के विकास के साथ उदगमा का पारंपरिक सूत और वस्त्र कारोबार धीरे-धीरे समाप्त हो गया। इसके साथ ही क्षेत्र के कई पारंपरिक व्यवसाय भी प्रभावित हुए। इस तरह महुअर नदी के आसपास का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यहां के गांवों के व्यापार, कारीगरी और रोजगार की कहानी भी इससे जुड़ी हुई है।

पदमावती के पास सिंध में होता है संगम
आगे बढ़ते हुए महुअर नदी ऐतिहासिक पदमावती क्षेत्र के समीप पहुंचती है और अंततः सिंध नदी में मिल जाती है। इस तरह उद्गम से संगम तक महुअर का पूरा प्रवाह क्षेत्र प्राचीन धार्मिक स्थलों, पुरातात्विक अवशेषों, ऐतिहासिक दुर्गों, व्यापारिक केंद्रों और लोक आस्थाओं को अपने साथ जोड़ता है।

एक नदी, दो पहचान-आज की जीवनरेखा और इतिहास की साक्षी
महुअर नदी की सबसे खास बात यही है कि इसकी पहचान केवल एक नदी के रूप में नहीं की जा सकती। एक ओर यह आज हजारों किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाती है, तो दूसरी ओर इसके किनारे सदियों पुरानी सभ्यता और संस्कृति के निशान बिखरे पड़े हैं।

महुआ के पेड़ की जड़ के पास से निकली एक छोटी सी जलधारा के रूप में जिस नदी की स्थानीय कहानी शुरू होती है, वही आगे चलकर गांवों की प्यास बुझाती है, खेतों को सींचती है और सिंध नदी में समाहित हो जाती है। इसके किनारों पर मौजूद मंदिर, मठ, स्तूप, शिलालेख और दुर्ग इस बात के प्रमाण हैं कि महुअर का पानी केवल वर्तमान को नहीं सींचता, बल्कि अपने भीतर अतीत की पूरी विरासत भी बहाकर ले जाता है। महुअर नदी इसलिए शिवपुरी अंचल के लिए सिर्फ पानी की धारा नहीं, बल्कि प्रकृति, लोकजीवन, आस्था और इतिहास को जोड़ने वाली एक जीवंत विरासत है।

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