Shivpuri News - गुरू तारा अस्त, अब चार महीने नहीं बजेंगे बैंड-बाजे, मांगलिक कार्यक्रमो पर ब्रेक

vikas
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शिवपुरी।
यदि आपके घर में शादी, गृह प्रवेश, जनेऊ या कोई अन्य मांगलिक आयोजन होना है, तो अब समय बेहद कम बचा है। गुरु तारा अस्त होने के बाद शुभ मुहूर्त लगभग समाप्त हो चुके हैं और 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ चातुर्मास शुरू होते ही अगले चार महीनों तक विवाह समेत सभी मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाएगा। ऐसे में 22 जुलाई को पड़ने वाली भड़ली नवमी का अबूझ सावा अब विवाह के लिए अंतिम बड़ा अवसर बनकर सामने आया है।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दिन बिना विशेष मुहूर्त देखे भी विवाह संपन्न कराने की परंपरा है। यही वजह है कि जिलेभर में इस एक दिन में 200 से अधिक विवाह होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

शादी की तैयारियां अंतिम दौर में, बुकिंग फुल
भड़ली नवमी के नजदीक आते ही जिले में शादी की तैयारियां चरम पर पहुंच गई हैं। मैरिज गार्डन, धर्मशालाएं, होटल, टेंट हाउस, कैटरिंग, बैंड-बाजा, डेकोरेशन और लाइटिंग कारोबारियों के यहां बुकिंग तेज हो गई है। जिन परिवारों के विवाह पहले से तय हैं, वे अब 22 जुलाई को ही आयोजन कराने की तैयारी में जुटे हुए हैं, क्योंकि इसके बाद सीधे देवउठनी एकादशी पर ही शुभ कार्यों का सिलसिला दोबारा शुरू होगा।

बाजारों में लौटी रौनक
शादी के अंतिम शुभ अवसर का असर बाजारों में भी साफ दिखाई देने लगा है। सराफा बाजार में आभूषणों की खरीदारी बढ़ गई है। रेडीमेड कपड़ों, साड़ियों, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू सामान और उपहार की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ रही है। व्यापारियों को उम्मीद है कि चातुर्मास शुरू होने से पहले होने वाले विवाह समारोहों से कारोबार में अच्छी बढ़ोतरी होगी।

क्यों रुक जाते हैं विवाह ?
ज्योतिषाचार्य पंडित मुकेश मोहन शास्त्री बताते हैं कि 16 जुलाई से गुरु तारा अस्त हो चुका है और 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। सनातन परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु के शयनकाल यानी चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ और अन्य मांगलिक संस्कार नहीं किए जाते। यह अवधि धार्मिक साधना और आध्यात्मिक चिंतन के लिए समर्पित मानी जाती है।

देवउठनी एकादशी के बाद फिर गूंजेंगी शहनाइयां
चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के साथ मांगलिक कार्यों की शुरुआत होगी। इसी दिन से विवाह के नए मुहूर्त भी प्रारंभ हो जाएंगे और एक बार फिर शहनाइयों की गूंज सुनाई देगी।

चातुर्मास में बढ़ जाता है धर्म-कर्म का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना का श्रेष्ठ काल माना जाता है। इस दौरान जप, तप, व्रत, दान, सत्संग, कथा-श्रवण और भगवान विष्णु एवं भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व रहता है। मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठानों की संख्या बढ़ जाती है और श्रद्धालु सात्विक जीवन, संयम तथा सेवा का संकल्प लेते हैं।

22 जुलाई बना सबसे बड़ा अबूझ सावा
भड़ली नवमी को बिना पंचांग या विशेष मुहूर्त देखे भी विवाह संपन्न कराने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। यही कारण है कि इस बार भी जिले में सैकड़ों जोड़े विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं। इसके बाद चार महीने तक विवाह समारोहों की रौनक थम जाएगी और धार्मिक वातावरण में पूजा-अर्चना तथा साधना का दौर शुरू हो जाएगा।

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