शिवपुरी, सीबर प्रोजेक्ट के मामले मे हाई कोर्ट ने कहा दोषी अधिकारियो की जिम्मेदारी तय हो

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ग्वालियर/शिवपुरी।
शिवपुरी के माधव नेशनल पार्क स्थित सांख्य सागर झील में लगातार पहुंच रहे सीवर और गंदे पानी के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने साफ शब्दों में पूछा कि जब 111 करोड़ रुपए खर्च कर बनाई गई पुरानी सीवरेज परियोजना आज तक प्रभावी रूप से काम नहीं कर सकी और उसकी जवाबदेही भी तय नहीं हुई, तो आखिर सरकार 191.24 करोड़ रुपए की नई परियोजना के लिए राशि कैसे मांग सकती है?

ग्वालियर खंडपीठ के जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला ने मामले की सुनवाई के दौरान नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव (एसीएस) को निर्देश दिए कि वे स्वयं पूरे रिकॉर्ड का परीक्षण करें, दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करें और 27 जुलाई को सीलबंद रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत करें।

111 करोड़ खर्च, लेकिन सीवर आज भी झील में
सुनवाई के दौरान विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपनी रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश की। रिपोर्ट में सांख्य सागर झील में गिर रहे सीवर और कचरे को रोकने के लिए 191.24 करोड़ रुपए की नई परियोजना का प्रस्ताव रखा गया। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि पहले यह बताया जाए कि 111 करोड़ रुपए खर्च कर बनाई गई सीवरेज लाइन और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) आखिर क्यों प्रभावी ढंग से संचालित नहीं हो पाए। यदि पहले की परियोजना विफल रही है तो उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय किए बिना नई राशि स्वीकृत करने का औचित्य क्या है? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी धन की जवाबदेही तय करना आवश्यक है और पहले पुरानी परियोजना की विफलता की जांच पूरी होनी चाहिए।

एसीएस खुद करेंगे रिकॉर्ड की जांच
खंडपीठ ने नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव को निर्देश दिए कि वे पूरे मामले का रिकॉर्ड स्वयं देखें, संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करें और यह भी बताएं कि परियोजना विफल होने के लिए कौन जिम्मेदार है। इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट 27 जुलाई को अदालत के समक्ष पेश करने के आदेश दिए गए हैं।

अल्का उपाध्याय के हलफनामे पर भी आपत्ति
सुनवाई के दौरान परियोजना से जुड़ी अधिकारी अल्का उपाध्याय का हलफनामा भी अदालत में पेश किया गया, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा कि बिना विधिवत अधिकृत प्रतिनिधित्व (वकालतनामा) के हलफनामा स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने निर्देश दिए कि वे स्वयं अथवा अपने निजी अधिवक्ता के माध्यम से नियमानुसार जवाब प्रस्तुत करें।

डिप्टी डायरेक्टर से पूछा- दबाव में हैं या कार्रवाई नहीं करना चाहते?
माधव टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर हरिओम ने अदालत को बताया कि पुराने अधिकारियों की जानकारी एकत्र की जा रही है। इस पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि वर्तमान में जो पर्यावरणीय नुकसान हो रहा है, उसके लिए मौजूदा जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही ? अदालत ने यहां तक कहा कि यदि अधिकारी किसी प्रकार के दबाव में कार्य कर रहे हैं तो विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को तलब किया जा सकता है। साथ ही डिप्टी डायरेक्टर को अपनी कार्यक्षमता साबित करने के लिए 15 दिन का अंतिम अवसर दिया गया।

सीएमओ को भी लगी अदालत की फटकार
शिवपुरी नगर पालिका के सीएमओ यशवंत राठौर भी सुनवाई के दौरान अदालत के सवालों के घेरे में रहे। सीएमओ द्वारा प्रस्तुत तस्वीरों में साफ दिखाई दिया कि सीवर का नाला सीधे सांख्य सागर झील में मिल रहा है। जब अदालत ने उनसे निगरानी और कार्रवाई से संबंधित रिपोर्ट मांगी तो वे कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके।इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि सीएमओ एसी कमरे में बैठकर अपनी जिम्मेदारी अधीनस्थ कर्मचारियों पर नहीं डाल सकते। कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद सीएमओ ने अदालत को आश्वासन दिया कि भविष्य में वे स्वयं पूरे मामले की नियमित निगरानी करेंगे और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।

पर्यावरण संरक्षण को लेकर सख्त रुख
हाईकोर्ट ने साफ संकेत दिए हैं कि सांख्य सागर जैसे पर्यावरणीय और वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण जलाशय को प्रदूषण से बचाने में किसी भी स्तर की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अदालत का मानना है कि सरकारी धन खर्च होने के बावजूद यदि परियोजना धरातल पर सफल नहीं हुई, तो केवल नई परियोजना बनाना समाधान नहीं है, बल्कि पहले पुरानी योजना की विफलता और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना आवश्यक है। अब पूरे मामले की नजर 27 जुलाई को पेश होने वाली रिपोर्ट पर टिकी है, जिसमें यह स्पष्ट होगा कि 111 करोड़ रुपए की परियोजना आखिर क्यों असफल रही और किन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाती है।

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