शिवपुरी। मानसून सक्रिय होने के बाद मच्छरो के पनपने का काल शुरू हो जाता है,और उसके साथ ही मलेरिया व डेंगू जैसी जानलेवा बीमारियों ने भी दस्तक दे दी है। लेकिन सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन बीमारियों से लड़ने के लिए बनाया गया मलेरिया विभाग खुद ही वेंटिलेटर पर नजर आ रहा है। विभाग में पिछले 12 वर्षों से 27 पद खाली पड़े हैं, कर्मचारियों की भारी कमी है और जो अभियान बारिश शुरू होते ही जमीन पर दिखना चाहिए था, वह अब तक कागजों से आगे नहीं बढ़ पाया है।
जुलाई माह में जिले में अब तक मलेरिया के 17 और डेंगू के 3 मरीज सामने आ चुके हैं। इसके बावजूद शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में न तो व्यापक स्तर पर फॉगिंग हो रही है और न ही एंटी लार्वा दवा का छिड़काव। कई मोहल्लों और गांवों में मलेरिया विभाग की टीम अब तक पहुंची ही नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब बीमारी फैलने से पहले रोकथाम होनी चाहिए, तब पूरा सिस्टम आखिर किसका इंतजार कर रहा है?
मच्छरों से लड़ने वाले सैनिक ही नहीं, कैसे जीतेगी जंग
भारत सरकार ने मलेरिया और मच्छरजनित बीमारियों पर नियंत्रण के लिए अलग विभाग बनाया, लेकिन शिवपुरी में यह विभाग वर्षों से कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है। हालात ऐसे हैं कि नियमित फील्ड स्टाफ न होने के कारण विभाग को दूसरे विभागों के कर्मचारियों का सहयोग मांगना पड़ता है। पहले पत्राचार होता है, फिर स्वीकृति का इंतजार होता है और तब तक मच्छर अपनी आबादी बढ़ाकर लोगों पर हमला बोल देते हैं। यानी मच्छरों की रफ्तार प्रशासनिक फाइलों से कहीं ज्यादा तेज है।
12 साल से खाली हैं 27 पद
विभाग में मलेरिया इंस्पेक्टर, जूनियर मलेरिया इंस्पेक्टर, लैब टेक्नीशियन, सुपरवाइजर, फील्ड वर्कर, स्प्रे वर्कर सहित 27 पद वर्ष 2013 से रिक्त पड़े हैं। कई कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन उनकी जगह नई नियुक्तियां नहीं हुईं। परिणाम यह है कि पूरे जिले का जिम्मा मुट्ठीभर कर्मचारियों के कंधों पर आ गया है। जिला मलेरिया अधिकारी सुनील खंडोलिया के अनुसार, विभाग ने करीब 30 अतिरिक्त कर्मचारियों की मांग एक वर्ष पहले वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी थी, लेकिन अब तक कोई नियुक्ति नहीं हुई।
आशा कार्यकर्ताओं के भरोसे चल रहा अभियान
स्थिति इतनी गंभीर है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लार्वा सर्वे और जागरूकता अभियान के लिए विभाग को आशा कार्यकर्ताओं का सहारा लेना पड़ रहा है। उन्हें प्रतिदिन करीब 200 रुपए मानदेय देकर काम कराया जाता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशिक्षित फील्ड स्टाफ की जगह अस्थायी व्यवस्था से व्यापक नियंत्रण संभव नहीं है।
नगर पालिका और विभाग के बीच समन्वय की कमी
मलेरिया विभाग का कहना है कि नगर पालिका से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। फॉगिंग और दवा छिड़काव जैसे कार्यों में नगर पालिका की सक्रिय भागीदारी जरूरी है, लेकिन फिलहाल दोनों विभागों के बीच समन्वय का अभाव दिखाई दे रहा है। इसका सीधा असर संक्रमण नियंत्रण पर पड़ रहा है।
शहर के कई इलाकों में जलभराव, खाली प्लॉटों में जमा कचरा और गंदा पानी मच्छरों के लिए सुरक्षित प्रजनन स्थल बन चुके हैं। टेकरी बाजार सहित कई क्षेत्रों में खाली प्लॉटों में पड़े कचरे से बड़ी संख्या में मच्छर पनप रहे हैं, लेकिन वहां नियमित कार्रवाई नजर नहीं आ रही।
आंकड़े भी कर रहे खतरे की ओर इशारा
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 6 वर्षों में जिले में मलेरिया के 738 और डेंगू के 929 मरीज सामने आए हैं। वहीं, पिछले एक वर्ष में डेंगू से 6 लोगों की मौत भी हो चुकी है। इसके बावजूद विभाग आज भी पर्याप्त संसाधनों और कर्मचारियों का इंतजार कर रहा है।
बारिश में बढ़ा खतरा, लेकिन तैयारी अधूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि बारिश का मौसम मच्छरों के प्रजनन का सबसे अनुकूल समय होता है। ऐसे में समय पर लार्वा सर्वे, फॉगिंग और एंटी लार्वा दवा का छिड़काव संक्रमण रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है। लेकिन शिवपुरी में यह पूरा तंत्र स्टाफ की कमी और विभागीय समन्वय के अभाव में प्रभावित है।
अब बड़ा सवाल यह है कि जब मच्छरों से लड़ने वाला विभाग ही कर्मचारियों के अभाव में 'वेंटिलेटर' पर हो, तो डेंगू और मलेरिया जैसी जानलेवा बीमारियों से जिले की जनता की रक्षा कौन करेगा? यही चिंता आज शिवपुरी के हजारों परिवारों के सामने खड़ी है।
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