सतेन्द्र उपाध्याय/शिवपुरी। शिवपुरी नगरी सिंधिया राजवंश की कर्मस्थली के रूप में भी पहचानी जाती है। आजादी के पूर्व और आजादी के बाद भी सिंधिया राजवंश के पास ही जिले की कमान रही है, चाहे वह किसी भी रूप में हो। सिंधिया देश में नाम नही एक ब्रांड है परन्तु ब्रांड जैसा काम इस जिले में नही है। आज इस जिले का नागरिक पानी की एक-एक बूंद की लड़ाई लड़ रहा है।
वनों से आच्छादित शिवपुरी को इस देश की आजादी के पूर्व सिंधिया राजवंश द्वारा ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया था। शिवपुरी का विकास तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुरूप पेयजल, सिंचाई व्यवस्था व आवासों का निर्माण कराया। साथ ही कुछ पर्यटक स्थल भी विकसित किये गए।
आजादी से पूर्व देश के विकसित शहरों में शिवपुरी का नाम आता था। अगर आजादी के पूर्व जैसा काम आजादी के बाद किया जाता तो शिवपुरी शहर 'स्मार्ट सिटी' का सबसे बेहतरीन मॉडल होता, परंतु ऐसा हुआ नहीं।
कुल मिलाकर कहने का सीधा-सीधा अर्थ यह है कि आजादी के बाद भी जनता ने सिंधिया ब्रांड को ही चुनाव में विजय दिलवाई है या फिर उसे जिस पर सिंधिया का हाथ हो, परन्तु इस शहर को ब्रांड के साथ रहने में क्या मिला, यह आप स्वयं जानते है। आम आदमी की सबसे जरूरी पानी की समस्या को तो मेरे पार्षद से लेकर इस देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी तक को पता है।
पूरे देश में कट्टी कल्चर कहीं नही है इस शहर में है। आज तक सिंधिया राजवंश ऐसा कोई कारखाना या फैक्ट्री नही दे पाया लिखे जा सके। इस शहर की दुर्दशा देख कर तो मेरा मन शहर शिवपुरी नही ग्राम शिवपुरी लिखने का करने लगा।
एक सीवर लाईन जिसका चीरहरण कर लिया है। शहर के आम आदमी को जलावर्धन योजना को पुन: शुरू कराने के लिए धरने पर बैठना पड़ा। पानी की लड़ाई इस जिले के नागरिक को लडऩी पड रही है।
योजनाओ का चीरहरण किस तरह से किया जाता है इस जिले के नागरिको को ज्ञात है। पानी आज नही कल आ जाऐगा। सडक भी सुधर जाऐगा पर सिसक-सिसक कर ऐसा काम तो कोई भी करा सकता है।
इस जिले सिंधिया जैसा नाम है, ब्रांड है, वैसा काम नही हुआ है। किसकी गलती है जनता की या ब्रांड की। कहने को इस परिवार से 250 साल के सबंध गिनाए जाते हैं। जनता इतने सालो के परिवरि रिश्ते को सहेज कर रखे है। एक माधौमहाराज ने शहर को आधुनिक बनाया था, उसका कर्ज जनता आज तक चुका रही है। हर सिंधिया और सिंधिया के आशीर्वाद प्राप्त को वोट देती आ रही है परंतु सिंधिया की ओर से अब शहर को कुछ नहीं मिलता।
सुना है ज्योतिरादित्य सिंधिया लोकसभा के नंबर 1 सांसद दर्ज हुए हैं। सबसे ज्यादा सवाल करते हैं, कई मुद्दों पर सरकार के कान खींच लेते हैं लेकिन समझ नहीं आता कि शिवपुरी के पेयजल वाले मामले में ज्योतिरादित्य सिंधिया, मेरे मोहल्ले के पार्षद जितने कमजोर क्यों दिखाई देते हैं।
यशोधरा राजे सिंधिया को शिवपुरी ने निमंत्रण नहीं दिया था। वो खुद आईं थीं। गली गली में नुक्कड़ संभाएं करके वचन दिया था कि शिवपुरी ही मेरा परिवार है। इसके विकास में कोई कसर नहीं छोडूंगी। विकास तो दूर की बात पीने को पानी तक उपलब्ध नहीं करा पा रहीं। उनकी मौजूदगी में प्रभारी मंत्री बेतुका बयान दे जातीं हैं और वो चुप रहीं। क्या मानें, क्या वो भी प्रभारी मंत्री के बयान का समर्थन कर रहीं हैं।
सुना है यशोधरा राजे सिंधिया मप्र की ताकतवर मंत्रियों में से एक हैं। तमाम आईएएस अफसर उनसे घबराते हैं। मुख्यमंत्री उनकी बात नहीं टालते। कहते हैं शिवपुरी में वही होगा जो यशोधरा राजे सिंधिया चाहेंगी। तो क्या यशोधरा राजे सिंधिया नहीं चाहतीं कि शिवपुरी को पेयजल मिले।
समझ नहीं आता इन दिग्गजों की ब्रांड वेल्यू पेयजल के मामले में कहां लुप्त हो जाती है। इनकी सारी ताकत कहां गायब हो जाती है। क्यों ये जनता को मजबूर कर रहे हैं कि वो सारा सम्मान और रिश्ते भुलाकर कुछ ऐसा कर जाए जो इतिहास में आज तक दर्ज नहीं हुआ।

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