करैरा का रामसती आश्रम आढऱ जहां पूरीं होती है मन की मुरादें

shailendra gupta
करैरा/शिवपुरी। आस्था का एक ऐसा स्थान है रामसती आश्रम जो कि करैरा क्षैत्र के ग्राम आढऱ मे स्थित है जिसे सब्जी बाले बाबा का स्थान के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि सच्चे मन से यहां आने बाले हर श्रद्धालु की मन की मुराद पूरी होती है।
सब्जी बाले बाबा के नाम से सुदूर अंचल मे ख्याति पा चुके इस स्थान पर प्रतिवर्ष मौनी अमावस्या से वसंत पंचमी तक विशाल मानस सम्मेलन होता है जिसमें कई स्थानों से आए महापुरूषों के प्रवचन होते है। कार्यक्रम के दौरान दूर दूर से भक्त जन यहां आते है।

आदि गुरू सब्जी बाले बाबा चमत्कारी थे यह बात उनके संपर्क में रहे कई भक्त जन कहते है। बताया जाता है कि बाबा का आगमन आढऱ गांव मे जुलाई 1976 मे हुआ था सादा फ कीरों वाला उनका जीवन था। वह केवल फल व सब्जी ही खते थे इस लिए उनका नाम सब्जी बाले बाबा हो गया । उनके पास कुछ पुराना साहित्य व एक छोटा सा शिवलिंग था तथा वह गावं मे रहते थे और गावं के बाहर पहाड़ी पर बने प्राचीन शिव मंदिर पर आया करते थे तब यह पहाड़ी निर्जर अवस्था मे थी जिस पर आज भव्य आश्रम व मंदिर बन गया है। 

बाबा की शरण मे पहुंचने वाले हर भक्त को कुछ न कुछ मिला है कोई भी निराश होकर नही गया और यही हाल अब उनकी समाधि स्थल रामसती आश्रम का है जहां सच्चे मन से भक्त जो भी अर्जी लगाता है वह पूरी होती है। सब्जी बाले बाबा एक वर्ष यहां रहे और 1977 मे कुंभ नहा कर जब वह लौटे तो गावं मे ही उन्हौने शरीर त्याग दिया और शरीर त्यागने से पहले अपने भक्तों से कह गए थे कि पहाड़ी पर उनकी समाधि बनाई जावे बाबा के आदेश का भक्तो ने पालन किया और पहाड़ी पर उनके पार्थिव शरीर को ले जा कर समाधि दिलाई  जो आज भी है तथा इसमे आदि गुरू महाराज कि अष्टधतु की प्रतिमा स्थापित है जिसे 1 अपैल 1990 में सिचाई विभाग मे कार्यरत रहे एसडीओ हरभजन सिह ने स्थापित कराया था। 

सब्जी बाले बाबा के शिष्य बने रामभरोसे जी जिन्हे भी लोग बाद मे सब्जी बाले महाराज के नाम से पुकारने लगे का जीवन बदलने का चमत्कार भी एक रोचक व सत्य घटना पर आधारित है जिसे स्वयं रामभरोसे जी महाराज सुनाते थे। उनके अनुशार वह गांव हतेड़ा मे रहकर सामान्य जीवन विता रहे थे और कई बार असमाजिक कार्यो भी रहे परंतु एक दिन चमत्कार हुआ गावं मे ही स्थित हनुमान जी की मूर्ति मे मे उन्हे सब्जी बाले बाबा के दर्शन हुए तो उनका मन बाबा से मिलने को बिचलित हो गया और वह बाबा की खोज मे निकल पड़े कई दिनों तक इधर-उधर भटकने के बाद जब आढऱ मे उन्होंने उसी दिव्य मूर्ति के दर्शन किए तो वह बाबा के चरणों मे गिर पड़े यही से उनका हृदय परिवर्तित हो गया और उन्होंने भक्ति का मार्ग अपना लिया। 

1977 मे जब सब्जी बाले बाबा ने शरीर त्यागा तभी से रामभरोसे जी महाराज ने अन्न का त्याग कर दिया और केवल सब्जी व फल का सेवन करने लगे। बाबा की समाधि के बाद रामभरोसे महाराज ने पहाड़ी पर ही अपना डेरा जमाया तथा आश्रम बनाकर यहां के विकास का जिम्मा लिए धीरे धीरे भक्तो का सहयोग मिला जो यहां मंदिरो निर्माण हुआ और बाबा की पुण्य स्मृति मे यहां आठ दिवसीय मानस सम्मेलन का कार्यक्रम प्रतिवर्ष होने लगा जो 37 वर्षो से होता आ रहा है। 3 जून 2009 मे रामभरोसे जी ने भी शरीर त्याग दिया और यहां सब्जी बाले गुरू महाराज के बगल से उनकी भी समाधि बना दी गई तथा मंदिर निर्माण कर 14 जनवरी 2010 को उसमे उनकी प्रतिमा स्थापित कर दी गई है।

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