शिवपुरी। शिवपुरी के प्रशासनिक सिस्टम के मुखिया कलेक्टर अर्पित वर्मा ने 27 जुलाई को निर्देश दिए थे कि फोरलेन पर निराश्रित गोवंश दिखाई नहीं देना चाहिए, पंचायतों और एनएचएआई की जवाबदेही तय होगी। लेकिन आदेश फाइल से सड़क तक पहुंचा ही नहीं। नतीजा यह है कि सड़क पर बैठे गोवंश से टकराकर वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं और इंसानों के साथ बेजुबान मवेशियों की भी जान जा रही है। बुधवार रात मुड़खेड़ा टोल प्लाजा के पास सड़क पर बैठे बैल से बाइक की टक्कर में 38 वर्षीय इंजीनियर विकास भार्गव की मौत इसका ताजा उदाहरण है। हादसे में बैल ने भी मौके पर ही दम तोड़ दिया।
विकास के परिवार के लिए यह हादसा इसलिए भी ज्यादा दर्दनाक है, क्योंकि वह करीब 15 दिन पहले ही पिता बने थे। एक ओर घर में नवजात के आने की खुशियां थीं और दूसरी ओर सड़क पर सिस्टम की लापरवाही ने परिवार से उसका सहारा छीन लिया। यह सिर्फ एक हादसा नहीं है। 1 अगस्त से अब तक फोरलेन पर गोवंश से जुड़े सात हादसों में 32 गोवंश की मौत हो चुकी है। बीते दो दिनों में ही सतनवाड़ा, देहरदा और सुमेला में तीन हादसे हुए, जिनमें 11 गोवंश मारे गए। सतनवाड़ा में हुए हादसे में कार सवार दो लोग भी गंभीर घायल हुए।
कलेक्टर ने आदेश दिया, लेकिन अमला सड़क तक नहीं पहुंचा
गोवंश के कारण लगातार हो रहे हादसों को देखते हुए कलेक्टर अर्पित वर्मा ने 27 जुलाई को दिशा-निर्देश जारी किए थे। आदेश में एनएचएआई के साथ ग्राम पंचायतों के सरपंच और सचिवों की जवाबदेही तय की गई थी। मकसद साफ था-खुले में घूमने वाले मवेशियों को सड़क से हटाना, पशुपालकों पर कार्रवाई करना और जरूरत पड़ने पर गोवंश को गौशालाओं तक पहुंचाना। लेकिन सवाल यह है कि जिला पंचायत सीईओ विजय राज अपने अधीनस्थ पंचायत अमले से इस निर्देश को धरातल पर क्यों नहीं उतार पाए।
यदि आदेश के बाद पंचायत स्तर पर नियमित निगरानी होती, पशुपालकों को चेताया जाता, खुले में घूम रहे गोवंश को पकड़ने के लिए कैटल कैचर और टीम सक्रिय होती और हादसे वाले स्थानों पर विशेष निगरानी रखी जाती, तो क्या सड़क पर बैठा गोवंश इस तरह लगातार मौत का कारण बनता।
आदेश की स्याही सूखी नहीं, सड़क पर हादसे शुरू
कलेक्टर के आदेश के बावजूद स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं आया। शिवपुरी जिले के अलग-अलग फोरलेन पर गोवंश के सड़क पर बैठने का सिलसिला जारी रहा। एक तरफ सरकारी आदेशों में जवाबदेही तय हुई, दूसरी तरफ सड़क पर जवाबदेही की कमी के परिणाम दिखाई देते रहे।
यह विरोधाभास अब आंकड़ों में भी सामने है। 1 अगस्त से अब तक सात हादसों में 32 गोवंश की मौत हो चुकी है। दो दिनों में तीन अलग-अलग स्थानों पर 11 गोवंश की मौत यह बताने के लिए पर्याप्त है कि समस्या किसी एक सड़क या एक गांव तक सीमित नहीं है।
तीन पंचायतों में आदेशों की हकीकत
सतनवाड़ा पंचायत:15-16 सितंबर की रात सतनवाड़ा तिराहे के पास तेज रफ्तार कार ने सड़क पर बैठे मवेशियों को टक्कर मार दी। तीन गाय और तीन बछड़ों की मौत हो गई, जबकि दो गाय घायल हुईं। सवाल है कि इतने संवेदनशील स्थान पर पंचायत की निगरानी व्यवस्था कहां थी?
सेसई सड़क पंचायत क्षेत्र:1 अगस्त को शिवपुरी-गुना फोरलेन पर अज्ञात वाहन ने सड़क पर मौजूद गोवंश को कुचल दिया। हादसे में सात गोवंश की मौत हुई। इसके बाद भी सड़क से मवेशियों को हटाने और उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की व्यवस्था पर सवाल बने रहे।
अमोला पंचायत:कोटा-झांसी फोरलेन पर 9-10 अगस्त और 30-31 अगस्त की रात हुए दो हादसों में 12 गोवंश की मौत हुई। इसके बावजूद ऐसे स्थानों पर स्थायी निगरानी, रेडियम टैगिंग और मवेशियों को सड़क से हटाने की व्यवस्था प्रभावी रूप से नजर नहीं आई।
सतनवाड़ा, देहरदा और सुमेला बने डेथ जोन
फोरलेन के कुछ हिस्से अब ऐसे स्थान बनते जा रहे हैं जहां सड़क पर बैठे गोवंश वाहन चालकों के लिए लगातार खतरा बने हुए हैं। सतनवाड़ा, देहरदा और सुमेला में हालिया हादसों ने इस खतरे को और उजागर किया है। रात के समय तेज रफ्तार वाहन चालकों को सड़क पर बैठे काले या गहरे रंग के मवेशी दिखाई नहीं देते। अचानक सामने आए गोवंश से टक्कर होने पर वाहन चालक के पास संभलने का समय भी नहीं रहता। यही स्थिति अब इंसानों और पशुओं दोनों के लिए जानलेवा साबित हो रही है।
सिस्टम का मुखिया’ निर्देश दे, तो नीचे तक जिम्मेदारी क्यों नहीं?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ हादसों का नहीं, निर्देशों के क्रियान्वयन का है। कलेक्टर ने समस्या को पहचानकर आदेश जारी किया था। आदेश में पंचायतों और अन्य संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी भी तय की गई थी। लेकिन जिला पंचायत स्तर से यदि अधीनस्थ अमले की प्रभावी मॉनिटरिंग नहीं हो पाई तो आदेश का असर जमीन पर कैसे दिखाई देता?
सिस्टम के मुखिया के निर्देश यदि फाइलों में ही घूमते रहेंगे और सड़क तक नहीं पहुंचेंगे तो सड़क पर लोग और गोवंश ही ‘हवा में उड़ते’ नजर आएंगे। हर हादसे के बाद मृत गोवंश और घायल वाहन चालक इस व्यवस्था से यही सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर जिम्मेदारी तय होने के बावजूद कार्रवाई कब होगी?
हादसे रोकने के लिए पांच जरूरी कदम
पशुपालकों पर कार्रवाई:खुले में मवेशी छोड़ने वाले पशुपालकों को चिन्हित कर जुर्माना और लापरवाही की स्थिति में नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
रेडियम टैग-बेल्ट:हाईवे से लगे गांवों के गोवंश की पहचान के लिए गले में रेडियम टैग या रिफ्लेक्टिव बेल्ट लगाने की व्यवस्था की जाए।
गोशालाओं को सक्रिय किया जाए: कैटल कैचर और विशेष टीम बनाकर सड़क पर घूमने वाले निराश्रित गोवंश को सुरक्षित रूप से गोशालाओं अथवा निर्धारित स्थानों पर पहुंचाया जाए।
पेट्रोलिंग और रोशनी बढ़े: एनएचएआई की पेट्रोलिंग बढ़ाई जाए। जहां बार-बार गोवंश सड़क पर पहुंचता है, वहां पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था और चेतावनी संकेत लगाए जाएं।
सरपंच-सचिवों की जवाबदेही तय हो: कलेक्टर के निर्देशों का पालन नहीं करने वाले पंचायत अमले की नियमित मॉनिटरिंग हो और लापरवाही मिलने पर कार्रवाई की जाए।
अब फिर निर्देश देने की बात
जिला पंचायत सीईओ विजय राज ने कहा है कि जहां गोवंश सड़क पर है, वहां पंचायतों को दोबारा निर्देश दिए जाएंगे। हादसा वाले स्थानों से मवेशियों को हटाकर गोशालाओं में भेजने की कार्रवाई की जाएगी।
वहीं कलेक्टर अर्पित वर्मा ने कहा कि निर्देश के बाद हाईवे से गोवंश हटाया गया था। यदि फिर से सड़क पर मवेशी आ रहे हैं तो जानकारी लेकर उन्हें गौशाला या अन्य सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जाएगा।

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