शिवपुरी में मिला ​दुनिया दुर्लभ जीव,60 मिलियन साल से धरती पर मौजूद होने का दावा

Lalit Mudgal
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शिवपुरी। जिस दुर्लभ वन्यजीव को दुनिया में सबसे ज्यादा अवैध तस्करी का शिकार माना जाता है, वह रविवार रात शिवपुरी के नरवर में एक घर के भीतर मिला। करीब रात 10 बजे कोटिया मोहल्ले में अचानक पैंगोलिन के पहुंचने से लोग हैरान रह गए। सूचना मिलते ही सर्पमित्र सलमान पठान और वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और इस दुर्लभ जीव को सुरक्षित रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ दिया।
नरवर की आबादी में पैंगोलिन का पहुंचना महज एक रेस्क्यू घटना नहीं, बल्कि शिवपुरी के जंगलों में इस दुर्लभ प्रजाति की मौजूदगी का महत्वपूर्ण संकेत भी माना जा रहा है।

सबसे खास बात यह है कि पैंगोलिन आमतौर पर शर्मीला और रात में सक्रिय रहने वाला जीव है तथा इंसानी आबादी से दूर रहना पसंद करता है। ऐसे में उसका जंगल से निकलकर नरवर के कोटिया मोहल्ले में पहुंचना इस संभावना को बल देता है कि आसपास के वन क्षेत्र में पैंगोलिन का प्राकृतिक आवास मौजूद हो सकता है। यदि एक पैंगोलिन यहां मिला है तो वन विशेषज्ञों के लिए यह क्षेत्र में उसकी आबादी और उसके प्राकृतिक आवास की तलाश का विषय बन सकता है।

दुर्लभ जीव का मिलना शिवपुरी के लिए खुशखबरी
पैंगोलिन का शिवपुरी के जंगलों में मिलना वन्यजीव प्रेमियों के लिए निश्चित तौर पर सुखद खबर है। यह जीव पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मुख्य रूप से चींटियों और दीमक को खाकर अपना भोजन प्राप्त करता है। शरीर पर मौजूद कठोर शल्क इसकी सबसे विशिष्ट पहचान हैं। खतरा महसूस होने पर पैंगोलिन अपने शरीर को गेंद की तरह समेट लेता है। सर्पमित्र सलमान पठान के मुताबिक, पकड़ा गया जीव पैंगोलिन है, जिसे स्थानीय स्तर पर 'चींटीखोर' भी कहा जाता है। वन विभाग की टीम ने उसे सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू किया और बाद में जंगल में छोड़ दिया।

दुनिया में सबसे ज्यादा तस्करी किए जाने वाले वन्यजीवों में शामिल
पैंगोलिन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जितना यह जीव इंसानों से दूर रहना चाहता है, उतना ही इंसान इसकी तलाश में जंगलों तक पहुंचता रहा है। पैंगोलिन को दुनिया में सबसे अधिक अवैध वन्यजीव व्यापार का शिकार होने वाली प्रजातियों में गिना जाता है। अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संगठनों के अनुसार, इसके शल्क और मांस के लिए इसकी बड़े पैमाने पर तस्करी की जाती रही है।

इसी वजह से जंगल में पैंगोलिन का सुरक्षित मिलना और उसे वापस प्राकृतिक वातावरण में छोड़ना संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। शिवपुरी जैसे वन क्षेत्र में इस प्रजाति की मौजूदगी सामने आना यह सवाल भी खड़ा करता है कि यहां इसके प्राकृतिक आवास और संभावित आबादी को लेकर वन विभाग को और अध्ययन करना चाहिए।

60 मिलियन साल से धरती पर मौजूद होने का दावा
पैंगोलिन को धरती के बेहद प्राचीन स्तनधारी जीवों में गिना जाता है। इसके पूर्वजों की मौजूदगी करोड़ों वर्ष पुरानी मानी जाती है। वर्तमान पैंगोलिन की सबसे बड़ी पहचान उसके शरीर को ढकने वाले कठोर शल्क हैं। सांप या छिपकली जैसा दिखाई देने के बावजूद यह सरीसृप नहीं, बल्कि स्तनधारी जीव है। यह मुख्य रूप से रात में सक्रिय होता है और अपनी लंबी जीभ की मदद से चींटियों व दीमक को खाता है। यही वजह है कि कई क्षेत्रों में इसे 'चींटीखोर' के नाम से भी जाना जाता है।

तस्करी ने खड़ा किया अस्तित्व का संकट
पैंगोलिन के लिए सबसे बड़ा खतरा प्राकृतिक शिकारी नहीं, बल्कि अवैध वन्यजीव व्यापार है। इसके मांस और शल्कों की मांग के कारण लंबे समय से इसका शिकार और अवैध व्यापार होता रहा है। विशेष रूप से एशिया के कुछ हिस्सों में इसके शल्कों का पारंपरिक चिकित्सा में इस्तेमाल किए जाने का दावा किया जाता रहा है, हालांकि इनके औषधीय लाभों के वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं।
अवैध व्यापार के कारण पैंगोलिन की कई प्रजातियां गंभीर संरक्षण संकट में हैं। यही कारण है कि जंगल में मिलने वाले प्रत्येक पैंगोलिन को सुरक्षित बचाना बेहद महत्वपूर्ण है।

वन विभाग ने लोगों से की अपील
पैंगोलिन के घर में मिलने की खबर फैलते ही आसपास के लोगों की भीड़ जमा हो गई। वन विभाग और सर्पमित्र ने लोगों से अपील की कि किसी भी वन्यजीव के आबादी वाले क्षेत्र में आने पर उसे पकड़ने या परेशान करने की कोशिश न करें। इसकी सूचना तत्काल वन विभाग या प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम को दें।

नरवर की यह घटना शिवपुरी के जंगलों के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि यहां एक ऐसे जीव की मौजूदगी सामने आई है जो सामान्य तौर पर बेहद गोपनीय जीवन जीता है। अब जरूरत इस बात की है कि इस एक पैंगोलिन की मौजूदगी को महज रेस्क्यू घटना मानकर खत्म न किया जाए, बल्कि आसपास के जंगलों में इसके प्राकृतिक आवास और संभावित आबादी का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक सर्वे किया जाए।

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