नरवर/शिवपुरी। सरकारी पट्टे की जमीन को बिना अनुमति बेचने के करीब दो दशक पुराने मामले में कलेक्टर न्यायालय शिवपुरी ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। नरवर तहसील के ग्राम अमरपुर में शासकीय पट्टे की एक हेक्टेयर भूमि को नियमों के विपरीत बेचे जाने की पुष्टि होने के बाद कलेक्टर अर्पित वर्मा ने भूमि को मध्यप्रदेश शासन के नाम दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही जमीन पर काबिज लोगों को बेदखल कर भूमि को शासन के पक्ष में सुरक्षित करने की कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं।
मामला वर्ष 2006 में हुई भूमि की बिक्री से जुड़ा है। कलेक्टर न्यायालय में सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि जिस जमीन को बेचा गया था, वह मूल रूप से शासन द्वारा पट्टे पर दी गई थी और उसकी बिक्री से पहले आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी।
1983-84 में शासन ने दिया था पट्टा
जानकारी के अनुसार ग्राम अमरपुर में सर्वे क्रमांक 448/1 की 0.50 हेक्टेयर और सर्वे क्रमांक 462/5 की 0.50 हेक्टेयर, यानी कुल एक हेक्टेयर भूमि, वर्ष 1983-84 में शासन ने गोकलिया नामक व्यक्ति को पट्टे पर दी थी। पट्टे की यह जमीन सामान्य निजी भूमि की तरह स्वतंत्र रूप से बेचने योग्य नहीं थी। इसके हस्तांतरण के लिए शासन द्वारा निर्धारित प्रक्रिया और सक्षम अधिकारी की अनुमति आवश्यक थी। इसके बावजूद वर्ष 2006 में गोकलिया ने यह जमीन साबो बाई को बेच दी। बिक्री के बाद मामला तब विवाद में आया, जब पट्टाधारक के परिवार की लच्छो बाई और अन्य लोगों ने इस बिक्री को चुनौती दी।
बिक्री पर उठे सवाल तो पहुंचा मामला कलेक्टर न्यायालय
आपत्ति करने वालों का तर्क था कि शासकीय पट्टे की भूमि को कलेक्टर की अनुमति के बिना बेचा ही नहीं जा सकता। इसी आधार पर जमीन की बिक्री को चुनौती दी गई। मामला आगे बढ़ा और संभाग आयुक्त ग्वालियर के आदेश के बाद दोबारा कलेक्टर न्यायालय शिवपुरी में सुनवाई के लिए पहुंचा। यहां पूरे प्रकरण की सुनवाई के दौरान भूमि के मूल पट्टे और बाद में हुए विक्रय से जुड़े दस्तावेजों की स्थिति पर विचार किया गया। सुनवाई में यह तथ्य सामने आया कि शासकीय पट्टे की भूमि के विक्रय से पहले कलेक्टर की लिखित अनुमति लेना आवश्यक था, लेकिन संबंधित भूमि को बेचते समय ऐसी अनुमति नहीं ली गई थी।
कलेक्टर ने कहा- भूमि शासन के नाम दर्ज की जाए
प्रकरण में नियमों का उल्लंघन पाए जाने के बाद कलेक्टर अर्पित वर्मा ने अंतिम आदेश जारी किया। आदेश में तहसीलदार नरवर को ग्राम अमरपुर की उक्त एक हेक्टेयर भूमि को राजस्व अभिलेखों में मध्यप्रदेश शासन के नाम दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही भूमि पर वर्तमान में मौजूद कब्जाधारियों को मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों के तहत बेदखल करने और भूमि को शासन के पक्ष में सुरक्षित करने की कार्रवाई करने को कहा गया है।
दो दशक पुरानी बिक्री का अब बदलेगा रिकॉर्ड
इस फैसले का असर उस जमीन के राजस्व रिकॉर्ड पर भी पड़ेगा, जो करीब दो दशक पहले बिक्री के जरिए एक व्यक्ति के नाम चली गई थी। अब कलेक्टर न्यायालय के आदेश के बाद जमीन को दोबारा शासन के नाम दर्ज किए जाने की प्रक्रिया शुरू होगी। यानी जिस भूमि का पट्टा वर्ष 1983-84 में दिया गया था और जिसे वर्ष 2006 में बेच दिया गया था, उसका राजस्व रिकॉर्ड अब शासन के नाम किया जाएगा। साथ ही जमीन पर मौजूद कब्जे को हटाने की कार्रवाई भी की जाएगी।
फैसले से साफ संदेश- पट्टे की जमीन की बिक्री पर नियम जरूरी
कलेक्टर न्यायालय के इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ है कि शासकीय पट्टे पर दी गई भूमि के हस्तांतरण में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। बिना सक्षम अनुमति के ऐसी जमीन की बिक्री विवाद का कारण बन सकती है और बाद में भूमि पर किए गए दावे भी कानूनी जांच के दायरे में आ सकते हैं। अमरपुर के इस मामले में करीब 20 साल पुरानी बिक्री पर आया फैसला अब न केवल जमीन के रिकॉर्ड को बदलने जा रहा है, बल्कि उन लोगों के कब्जे पर भी असर डालेगा, जो वर्तमान में उक्त भूमि पर काबिज हैं।
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