पिछोर। शैक्षणिक सत्र शुरू हुए कई महीने बीत चुके हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों में बच्चों को अब भी उनकी जरूरत की सभी किताबें नहीं मिल पाने का मुद्दा सामने आ रहा है। इसी समस्या को लेकर शिवपुरी जिले के पिछोर क्षेत्र में एक पिता ने ऐसा कदम उठा लिया, जिसने शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ प्रशासनिक अनुमति और नागरिक अधिकारों को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
मनपुरा गांव निवासी दिनेश सगर की बेटी सरकारी स्कूल में कक्षा छठवीं की छात्रा है। दिनेश का कहना है कि नए शैक्षणिक सत्र में स्कूल खुलने के बावजूद उसकी बेटी को अभी तक सभी पाठ्यपुस्तकें नहीं मिली हैं। बेटी की पढ़ाई प्रभावित होते देख उसने इसे केवल अपने परिवार की समस्या न मानकर गांव-गांव के बच्चों से जुड़ा मुद्दा माना और शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक सुधार को लेकर 22 दिन की जागरूकता यात्रा निकालने का फैसला किया।
दिनेश ने 19 अगस्त को पिछोर एसडीएम के समक्ष आवेदन देकर 20 अगस्त से यात्रा शुरू करने की अनुमति मांगी थी। उसका कहना था कि यात्रा के दौरान वह अलग-अलग गांवों में जाकर सरकारी स्कूलों, अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों और छात्रावासों की व्यवस्थाओं को देखना तथा लोगों को शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना चाहता है। आवेदन में उसने यह भी स्पष्ट किया था कि यात्रा के दौरान कोई असंवैधानिक गतिविधि नहीं की जाएगी। लेकिन प्रशासन से अनुमति नहीं मिली। इसके बाद दिनेश ने विरोध का ऐसा तरीका चुना, जिससे मौके पर पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों में हड़कंप मच गया। वह पेट्रोल की बोतल लेकर पानी की टंकी पर चढ़ गया।
बेटी की किताब से शुरू हुआ सवाल, व्यवस्था तक पहुंचा
दिनेश का कहना है कि जब उसकी बेटी को ही स्कूल से पूरी किताबें नहीं मिलीं तो संभव है कि दूसरे बच्चों को भी इसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हो। इसी सोच के साथ उसने शिक्षा व्यवस्था को करीब से देखने और लोगों के बीच जागरूकता फैलाने की योजना बनाई।
उसने स्कूलों में पढ़ाई की स्थिति के साथ ही मध्याह्न भोजन यानी मिड-डे मील की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए हैं। उसका कहना है कि बच्चों को मिलने वाली शिक्षा और भोजन दोनों की व्यवस्था की वास्तविक स्थिति सामने आनी चाहिए। दिनेश ग्रेजुएट है और उसका दावा है कि उसका उद्देश्य किसी सरकारी व्यवस्था को बाधित करना नहीं, बल्कि आम लोगों और बच्चों से जुड़े मुद्दों को सामने लाना है।
जनता को व्यवस्था देखने का अधिकार होना चाहिए
दिनेश अपनी प्रस्तावित यात्रा में स्कूलों, अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों और छात्रावासों का दौरा करना चाहता था। उसका तर्क है कि जब ये संस्थान आम जनता के लिए हैं तो उनकी व्यवस्थाओं को लेकर लोगों की आवाज भी सुनी जानी चाहिए।
हालांकि प्रशासन का कहना है कि सरकारी संस्थानों में किसी व्यक्ति को अपने स्तर पर निरीक्षण करने की अनुमति देना प्रशासनिक नियमों के अनुरूप नहीं है। पिछोर तहसीलदार शिवशंकर गुर्जर के अनुसार, दिनेश यात्रा के दौरान सरकारी संस्थानों की व्यवस्थाएं देखना चाहता है, लेकिन इस तरह सीधे जाकर निरीक्षण करने की अनुमति देना उचित नहीं माना जा सकता।
यहीं से पूरा मामला एक बड़े सवाल में बदल गया है-क्या किसी नागरिक को शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लिए आवाज उठाने का अधिकार है, और यदि है तो उस आवाज को प्रशासन तक पहुंचाने का वैधानिक रास्ता क्या होना चाहिए?
टंकी पर चढ़ने के बाद प्रशासन के सामने नई चुनौती
गुरुवार दोपहर करीब 3 बजे दिनेश पानी की टंकी पर चढ़ गया। उसके पास पेट्रोल की बोतल होने की जानकारी मिलते ही पुलिस ने मौके पर सतर्कता बढ़ा दी। पिछोर थाना प्रभारी नीतू सिंह अहिरवार के अनुसार, युवक को लगातार समझाइश देकर नीचे उतारने का प्रयास किया जा रहा है। पुलिस के मुताबिक वह अपनी मांग पर अड़ा हुआ है और नीचे नहीं उतरने की बात कह रहा है।
इस घटनाक्रम ने प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ युवक की मांग शिक्षा, स्वास्थ्य और बच्चों के अधिकारों से जुड़े सवाल उठा रही है, तो दूसरी तरफ विरोध का तरीका सुरक्षा के लिहाज से गंभीर स्थिति पैदा कर रहा है।
जेन अल्फा की पढ़ाई से उठी आवाज, दूसरे बच्चों तक पहुंची
दिनेश की बेटी Generation Alpha यानी जेन अल्फा पीढ़ी का हिस्सा है-ऐसी पीढ़ी जो डिजिटल दौर में शिक्षा हासिल कर रही है और जिसके लिए किताबों के साथ डिजिटल संसाधन भी महत्वपूर्ण हो चुके हैं। लेकिन दूसरी ओर, सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली बच्ची को अगर जरूरी पाठ्यपुस्तकें समय पर नहीं मिलतीं, तो यह डिजिटल युग और जमीनी शिक्षा व्यवस्था के बीच के अंतर को भी सामने लाता है। एक पिता का अपनी बेटी की किताबों को लेकर शुरू हुआ सवाल अब स्कूलों की शिक्षण व्यवस्था, मिड-डे मील, अस्पतालों की स्थिति और प्रशासनिक जवाबदेही तक पहुंच गया है।
22 दिन की यात्रा की अनुमति बनी विवाद का केंद्र
दिनेश ने 20 अगस्त से यात्रा शुरू करने की अनुमति मांगी थी। उसने चेतावनी दी थी कि यदि 20 अगस्त सुबह 10 बजे तक अनुमति नहीं मिली तो वह आंदोलन करने को मजबूर होगा। अनुमति नहीं मिलने के बाद उसने पानी की टंकी पर चढ़कर विरोध शुरू कर दिया।
मामला अब सिर्फ एक व्यक्ति के विरोध तक सीमित नहीं रह गया है। इसके केंद्र में सरकारी स्कूलों में बच्चों को मिलने वाली सुविधाएं, पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता, मिड-डे मील की गुणवत्ता, सरकारी संस्थानों की निगरानी और नागरिकों द्वारा प्रशासन के सामने सवाल उठाने के तरीके जैसे कई मुद्दे आ गए हैं।

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