Shivpuri News: रावत & बद्रर्स ने किया पुलिस कंट्रोल रूम, SDOP कार्यालय सहित मंदिर वाली जमीन पर दावा

Lalit Mudgal
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शिवपुरी।
जिस जमीन पर आज पुलिस कंट्रोल रूम की गतिविधियां संचालित हो रही हैं, जहां एसडीओपी कार्यालय बना है और बायपास रोड पर हनुमान मंदिर मौजूद है, उसी करीब 8.5 बीघा जमीन के मालिकाना हक को लेकर अब न्यायालय में बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। रावत बंधुओं का दावा है कि यह जमीन उनके दादा बहोरन सिंह रावत के नाम वर्ष 1953 के राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज थी और उनके पास इससे जुड़े दस्तावेज भी मौजूद हैं। 

सवाल यह है कि यदि जमीन पुश्तैनी थी तो वह सरकारी और फिर पुलिस विभाग के नाम कैसे दर्ज हो गई? किस प्रक्रिया के तहत उसका रिकॉर्ड बदला गया और पुलिस विभाग को इस जमीन पर कब्जे का अधिकार किस आधार पर मिला। इसी सवाल को लेकर प्रकाश रावत और उनके परिजनों ने पहले निचली अदालत का दरवाजा खटखटाया। वहां राहत नहीं मिलने के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां रावत बंधुओं के अनुसार उन्हें स्टे (स्थगन आदेश) मिला है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब यह जमीन विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

8.5 बीघा जमीन पर रावत परिवार का दावा
रावत बंधुओं का कहना है कि पुरानी शिवपुरी-राजपुरा रोड क्षेत्र में उनके पूर्वजों की करीब 8.5 बीघा जमीन थी। वर्तमान में इस जमीन का एक हिस्सा पुलिस कंट्रोल रूम और एसडीओपी कार्यालय के निर्माण में उपयोग हो रहा है, जबकि कुछ हिस्सा अभी भी खाली बताया जा रहा है।

प्रकाश रावत द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार वर्तमान सर्वे नंबर 143, रकबा 4.578 हेक्टेयर की जमीन शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है और पुलिस विभाग के नाम नजूल रिकॉर्ड में अंकित बताई जा रही है। यह भूमि ग्राम रजपुरा, पटवारी हल्का नंबर 41, छावनी, राजस्व निरीक्षक मंडल क्रमांक 02, शिवपुरी तहसील में स्थित बताई गई है। रावत परिवार का दावा है कि इस जमीन के पुराने सर्वे नंबर 177/1, 177/2, 177/3 और 87 रहे हैं और पुराने राजस्व रिकॉर्ड में यह भूमि उनके पूर्वजों के नाम दर्ज थी।

1953 के रिकॉर्ड से उठे सवाल
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वर्ष 1953 का राजस्व रिकॉर्ड बताया जा रहा है। रावत परिवार के अनुसार उस समय जमीन उनके दादा बहोरन सिंह रावत के नाम दर्ज थी। परिवार का कहना है कि यदि पुराने राजस्व रिकॉर्ड में जमीन उनके पूर्वज के नाम थी तो बाद के रिकॉर्ड में यह जमीन सरकारी और फिर पुलिस विभाग के नाम किस आधार पर दर्ज हुई, इसकी जानकारी स्पष्ट होनी चाहिए।

यही वह बिंदु है जिसने पूरे विवाद को गंभीर बना दिया है। जमीन का रिकॉर्ड कब बदला, किस आदेश के आधार पर बदला और किस विभाग ने इसका आवंटन किया—इन सवालों के जवाब अब न्यायालय में सामने आने हैं।

निचली अदालत में नहीं मिली राहत, हाईकोर्ट पहुंचे
रावत बंधुओं ने बताया कि जमीन के मालिकाना हक को लेकर उन्होंने पहले शिवपुरी जिला न्यायालय में मामला उठाया था। वहां उनके पक्ष में निर्णय नहीं आया। न्यायालय की कार्यवाही में इस भूमि को राजस्व विभाग द्वारा आवंटित भूमि माना गया। इसके बाद रावत परिवार ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट में अधिवक्ता नवल किशोर गुप्ता ने रावत परिवार की ओर से मामले के दस्तावेज और तथ्य प्रस्तुत किए। रावत बंधुओं के मुताबिक सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने फिलहाल उन्हें स्टे प्रदान किया है। रावत परिवार का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश की प्रति के साथ उन्होंने कलेक्टर और एसपी को भी आवेदन सौंपकर पूरे मामले की जानकारी दी है।

पुलिस का पक्ष-हाईकोर्ट में रखेंगे पूरे तथ्य
पुलिस अधीक्षक यांगचेन डोलकर भूटिया का कहना है कि यह विवाद नया नहीं है और पहले से न्यायालय में चल रहा है। उनके अनुसार निचली अदालत में पुलिस विभाग के पक्ष में निर्णय हुआ था। एसपी ने कहा कि हाईकोर्ट से आए आदेश की उन्हें अभी पूरी जानकारी नहीं है। यदि रावत परिवार को हाईकोर्ट से स्टे मिला है तो पुलिस विभाग न्यायालय के समक्ष पूरे तथ्य और दस्तावेज प्रस्तुत करेगा। उनका कहना है कि अंततः यह भूमि पुलिस विभाग की ही होने की स्थिति स्पष्ट होगी।

अब सबसे बड़ा सवाल-जमीन पुलिस के नाम कैसे हुई?
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि 1953 के रिकॉर्ड में यदि जमीन रावत परिवार के पूर्वज के नाम दर्ज थी, तो बाद में वह सरकारी भूमि और फिर पुलिस विभाग के नाम कैसे पहुंची?
क्या जमीन का अधिग्रहण हुआ था?
क्या राजस्व विभाग ने इसका विधिवत आवंटन किया था?
क्या इसके लिए कोई आदेश जारी हुआ था?
या पुराने रिकॉर्ड में किसी प्रक्रिया के तहत इसका नाम बदला गया?

इन सवालों के जवाब राजस्व रिकॉर्ड, नजूल रिकॉर्ड और जमीन से जुड़े पुराने आदेशों से ही स्पष्ट होंगे। फिलहाल रावत परिवार अपने पुराने दस्तावेजों के आधार पर मालिकाना हक का दावा कर रहा है, जबकि पुलिस विभाग जमीन को अपने अधिकार क्षेत्र की बता रहा है।

रावत बोले-8.5 बीघा जमीन कोई छोटी जमीन नहीं
दावाकर्ता प्रकाश रावत का कहना है कि उनके दादा-परदादा के नाम दर्ज रही जमीन को लेकर उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। उनके मुताबिक 8.5 बीघा जमीन कोई छोटी जमीन नहीं होती और उनके परिवार के पास पुराने दस्तावेज मौजूद हैं। अब हाईकोर्ट में होने वाली आगे की सुनवाई से यह तय होने की दिशा में मामला बढ़ेगा कि जमीन के पुराने और वर्तमान रिकॉर्ड में अंतर क्यों है और इस भूमि पर पुलिस विभाग का अधिकार किस आधार पर स्थापित हुआ।

फिलहाल हाईकोर्ट से मिले स्टे के बाद पुलिस कंट्रोल रूम और एसडीओपी कार्यालय वाली इस जमीन का विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। आने वाले समय में राजस्व रिकॉर्ड और दोनों पक्षों द्वारा पेश किए जाने वाले दस्तावेज इस पूरे मामले की असली तस्वीर सामने ला सकते हैं।

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