शिवपुरी। मुगल काल के समय देश मे मंदिर तोडे जाने और मुर्तियो को खंडित किए जाने की इतिहास की घटनाओ मे पढा होगा,लेकिन शिवपुरी मे इस घटना से एक कडी जुडी हुई मिलती है। इस कारण भगवान श्रीकृष्ण के बडे भ्राता एक मंदिर मे नही एक मकान मे पिछले डेढ सदी से निवास कर रहे है।
शिवपुरी समाचार डॉट कॉम की टीम ने इस मंदिर से जुडे तथ्यो और इतिहास को उकेरा हैं। हम बात कर रहे है शिवपुरी शहर की पुरानी शिवपुरी नीलघर चौराहे पर स्थित एक मकान मे बिजराजमान बलदाउ के मंदिर की। यहां पर बडे श्रीकृष्ण के बडे भ्राता अकेले ही विराजमान है।
कहा जाता है कि जब आक्रमणों का दौर था और मंदिरों पर खतरा मंडरा रहा था, तब बलदाऊ जी की प्रतिमा को सुरक्षित रखने के लिए खुले मंदिर के बजाय मकान के भीतर स्थापित कर दिया गया। तब से लेकर आज तक न प्रतिमा का स्थान बदला और न आस्था की यह परंपरा टूटी। चार पीढ़ियां बीत गईं, लेकिन एक ही परिवार आज भी पूरी श्रद्धा के साथ बलदाऊ जी की पूजा-अर्चना कर रहा है। जन्माष्टमी पर जब पूरा शहर कान्हा के रंग में रंगा है, तब पुरानी शिवपुरी के नीलगर चौराहे के पास स्थित यह अनोखा मंदिर अपनी 100 से 150 साल पुरानी कहानी के साथ श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच रहा है।
शिवपुरी के इस मंदिर को देखने पहुंचने वाला व्यक्ति पहली नजर में शायद यह समझ ही न पाए कि साधारण से दिखाई देने वाले मकान के भीतर भगवान बलदाऊ जी का इतना पुराना मंदिर मौजूद है। स्थानीय लोगों के मुताबिक पुराने समय में मंदिरों को आक्रमणों से बचाने के लिए कई धार्मिक प्रतिमाओं को सुरक्षित स्थानों पर स्थापित किया गया था। इसी क्रम में बलदाऊ जी की प्रतिमा को भी मकान के भीतर स्थापित किए जाने की मान्यता है। समय बीतता गया, शहर का स्वरूप बदलता गया, लेकिन मकान के भीतर विराजमान बलदाऊ जी की पूजा-अर्चना की परंपरा आज भी जारी है। यही वजह है कि यह मंदिर शिवपुरी के धार्मिक स्थलों में अपनी अलग पहचान रखता है।
चार पीढ़ियों से एक ही परिवार संभाल रहा पूजा की जिम्मेदारी
मंदिर में पूजा-अर्चना करने वाले बंटी पुजारी के अनुसार उनके परिवार की चार पीढ़ियां बलदाऊ जी की सेवा करती आ रही हैं। उनके दादा, परदादा और पिता सहित परिवार के अन्य सदस्यों ने भी लंबे समय तक मंदिर में पूजा-अर्चना की। यानी यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक परिवार की कई पीढ़ियों की आस्था, सेवा और परंपरा का भी केंद्र है। जिस पूजा को कभी उनके पूर्वजों ने संभाला था, वही जिम्मेदारी आज नई पीढ़ी निभा रही है।
आक्रमणों से बचाने के लिए घर के भीतर स्थापित करने की मान्यता
मंदिर से जुड़े लोगों के मुताबिक इसके मकान के भीतर होने के पीछे एक पुरानी ऐतिहासिक मान्यता है। स्थानीय धर्मप्रेमी बताते हैं कि पुराने समय में मुस्लिम आक्रमणों के दौरान अनेक मंदिरों को नुकसान पहुंचने की घटनाएं हुई थीं। ऐसी परिस्थितियों में धार्मिक प्रतिमाओं को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें छिपाकर सुरक्षित स्थानों पर स्थापित किया जाता था। इसी मान्यता के अनुसार बलदाऊ जी की प्रतिमा को भी मंदिर के खुले स्वरूप के बजाय मकान के भीतर स्थापित किया गया था।
बलराम जयंती पर सजा मंदिर, लगा छप्पन भोग
जन्माष्टमी से पहले इस मंदिर में बलराम जयंती भी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई। इस अवसर पर बलदाऊ जी का विशेष श्रृंगार किया गया और मंदिर को फूलों से आकर्षक ढंग से सजाया गया। भगवान को छप्पन भोग अर्पित किया गया। धार्मिक आयोजन के बाद श्रद्धालुओं के लिए भंडारे और प्रसाद वितरण की व्यवस्था भी की गई। बड़ी संख्या में लोगों ने मंदिर पहुंचकर बलदाऊ जी के दर्शन किए और पूजा-अर्चना की। इसके बाद अब श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर भी मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई है।
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