शिवपुरी, 30 साल पुराने पिता पुत्र हत्याकाण्ड मे हाईकोर्ट ने किया बडा उल्टफेर, पुलिस के सबूतो पर सवाल

Lalit Mudgal
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शिवपुरी। करीब तीन दशक पहले शिवपुरी में हुए चर्चित दोहरे हत्याकांड का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। वर्ष 1996 में इंदर सिंह और उनके बेटे सुखदेव सिंह की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा भुगत चुके छह आरोपियों को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने दोषमुक्त कर दिया है।
हाईकोर्ट ने मामले की जांच, बरामदगी और फॉरेंसिक साक्ष्यों पर गंभीर सवाल उठाते हुए अभियोजन की पूरी कहानी को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मामले में साक्ष्य जुटाए नहीं गए, बल्कि झूठे साक्ष्य गढ़े जाने की स्थिति सामने आती है।

जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए शिवपुरी के तृतीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 13 अगस्त 2001 को सुनाए गए फैसले को निरस्त कर दिया। उस फैसले में छह आरोपियों को हत्या की साजिश, हत्या के बाद साक्ष्य मिटाने और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट के फैसले के बाद हरप्रीत सिंह, रघुवीर सिंह, पाल सिंह, नरेंद्र सिंह, बलवंत सिंह और गुरप्रीत सिंह को इस मामले में दोषमुक्त कर दिया गया है।

ग्वालियर से गांव लौटते समय हुई थी पिता-पुत्र की हत्या
अभियोजन के अनुसार, 29 मार्च 1996 की रात इंदर सिंह और उनके बेटे सुखदेव सिंह मोटरसाइकिल से ग्वालियर से अपने गांव बांसखेड़ी लौट रहे थे। इसी दौरान रास्ते में दोनों की हत्या कर दी गई थी। पिता-पुत्र के घर नहीं पहुंचने पर गुमशुदगी दर्ज कराई गई और पुलिस ने मामले की जांच शुरू की।

जांच के दौरान पुलिस ने दावा किया कि आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद उनकी निशानदेही पर परसारी क्षेत्र की खदानों में पत्थरों के नीचे दबे दोनों शव बरामद किए गए। इसी तरह झाड़ियों से मोटरसाइकिल बरामद किए जाने की बात भी पुलिस ने कही थी।

इसके बाद मामले में आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और पुलिस की जांच के आधार पर प्रकरण अदालत तक पहुंचा। वर्ष 2001 में शिवपुरी की अदालत ने आरोपियों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। लंबे समय तक यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में चलता रहा और आरोपी जेल में रहे। बाद में हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद वे जेल से बाहर आए। लेकिन लगभग तीन दशक बाद हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान अभियोजन की कहानी और उसके आधार पर जुटाए गए साक्ष्यों पर ही गंभीर सवाल खड़े हो गए।

22 दिन बाद नाखूनों से खून मिलने का दावा भी संदेह में
मामले में पुलिस की फॉरेंसिक जांच भी हाईकोर्ट की जांच के केंद्र में रही। पुलिस ने आरोपियों के नाखूनों के अंश घटना के करीब 22 दिन बाद जब्त किए थे और दावा किया था कि उनमें खून के अंश मिले हैं। हाईकोर्ट ने इस साक्ष्य को वैज्ञानिक कसौटी पर परखा और इसे विश्वसनीय नहीं माना। कोर्ट ने सवाल उठाया कि घटना के इतने लंबे समय बाद नाखूनों में खून के अंश सुरक्षित रहने का दावा किस आधार पर किया गया।

इसके अलावा एफएसएल रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि नाखूनों में मिले कथित रक्त के अंश मानव रक्त के थे या नहीं और उनका मिलान मृतकों के ब्लड ग्रुप से भी स्थापित नहीं हुआ। ऐसे में इस साक्ष्य की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा हुआ।

चार महीने बाद जीप से ID कार्ड मिलने की कहानी पर भी सवाल
मामले में एक जीप से मृतक का ID कार्ड मिलने का दावा भी पुलिस की जांच के लिए अहम बताया गया था। पुलिस के अनुसार 4 अगस्त 1996 को जीप जब्त कर उसमें मृतक का ID कार्ड बरामद किया गया था। लेकिन हाईकोर्ट के सामने जो तथ्य आए, उन्होंने इस कहानी को ही सवालों के घेरे में ला दिया। कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि संबंधित जीप 23 अप्रैल 1996 को ही पुलिस के कब्जे में आ चुकी थी और उसकी फॉरेंसिक जांच भी की जा चुकी थी। ऐसे में करीब चार महीने बाद उसी जीप से मृतक का ID कार्ड बरामद होने का दावा कोर्ट को संदिग्ध लगा। इस घटनाक्रम ने पुलिस की बरामदगी की प्रक्रिया और पूरे साक्ष्य-संग्रह पर सवाल खड़े कर दिए।

गवाहों के बयानों में भी सामने आया भारी विरोधाभास
हाईकोर्ट ने केवल भौतिक और फॉरेंसिक साक्ष्यों को ही नहीं परखा, बल्कि मामले में पेश किए गए गवाहों के बयानों का भी बारीकी से परीक्षण किया। सुनवाई के दौरान गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास सामने आए। अदालत ने पाया कि अभियोजन की कहानी को मजबूत करने वाले बयानों में आपसी संगति का अभाव था। ऐसे में केवल उन बयानों के आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराना उचित नहीं माना जा सकता था। कोर्ट ने उपलब्ध पूरे साक्ष्य और जांच प्रक्रिया को देखने के बाद अभियोजन के मामले पर भरोसा करने से इनकार कर दिया।

पुरानी रंजिश में फंसाने की बात भी आई सामने
मामले में बचाव पक्ष की ओर से यह बात भी सामने रखी गई कि आरोपियों को पुरानी रंजिश के चलते हत्या के मामले में फंसाया गया था। हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा के दौरान इस पहलू को भी गंभीरता से देखा। जब कथित बरामदगी, फॉरेंसिक साक्ष्य, ID कार्ड की बरामदगी और गवाहों के बयानों में ही विसंगतियां सामने आईं तो अभियोजन की कहानी संदेह से परे साबित नहीं हो सकी।

2001 की उम्रकैद पर 2026 में लगी रोक
शिवपुरी की अदालत ने 13 अगस्त 2001 को छह आरोपियों को आईपीसी की धारा 302/120बी, 201 और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराया था। करीब 25 साल बाद हाईकोर्ट ने उस फैसले को निरस्त करते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया। इस फैसले के साथ 1996 में शुरू हुआ यह चर्चित मामला एक बेहद महत्वपूर्ण न्यायिक मोड़ पर पहुंच गया है। एक ओर दो लोगों की हत्या की घटना का दर्दनाक पक्ष है, तो दूसरी ओर हाईकोर्ट की टिप्पणी ने उस मामले में पुलिस जांच और साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

संदेह का लाभ बना फैसले का आधार
आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को आरोप संदेह से परे साबित करने होते हैं। इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन द्वारा पेश किए गए महत्वपूर्ण साक्ष्यों में ही विश्वसनीयता की कमी और विरोधाभास मौजूद थे। ऐसे में आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त ठोस आधार नहीं बचता था।

हाईकोर्ट के फैसले ने तीन दशक पुराने शिवपुरी दोहरे हत्याकांड की पूरी कहानी को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। जिस मामले में छह लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, उसी मामले में अब हाईकोर्ट ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया है और पुलिस की जांच में साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल दर्ज किए हैं।

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