शिवपुरी। शहर में बिना डिग्री, बिना वैध रजिस्ट्रेशन और बिना चिकित्सकीय अनुमति के इलाज का कारोबार किस तरह बेखौफ चल सकता है, इसका एक मामला रविवार को सामने आया। झांसी तिराहे पर सेसई मिष्ठान भंडार के बगल में एक ऐसा क्लीनिक संचालित मिला, जिसके बाहर बोर्ड पर डा. शेख-गुप्त रोग विशेषज्ञ लिखा था। दिलचस्प बात यह है कि इस कथित क्लीनिक का पता स्वास्थ्य विभाग की नियमित निगरानी से नहीं, बल्कि कलेक्टर तक पहुंची सूचना के बाद चला।
मौके पर पहुंची स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जब दस्तावेजों की पड़ताल की तो कथित डॉक्टर की डिग्री और पंजीयन को लेकर सवाल खड़े हो गए। क्लीनिक में दवाइयां और इंजेक्शन भी मिले। जांच के बाद टीम ने दुकान को सील कर दिया। अब स्वास्थ्य विभाग ने संबंधित व्यक्ति के खिलाफ पुलिस में एफआईआर के लिए आवेदन दिया है।
कलेक्टर को मिली सूचना, तब खुला गुप्त क्लीनिक का राज
जानकारी के अनुसार शिवपुरी कलेक्टर अर्पित वर्मा को झांसी तिराहे पर संचालित इस कथित क्लीनिक की सूचना मिली थी। कलेक्टर के निर्देश पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजय ऋषीश्वर ने जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. सुनील खंडोलिया के नेतृत्व में टीम गठित की। टीम में एपीडेमियोलॉजिस्ट लालजू शाक्य और फार्मासिस्ट वालेन्दु रघुवंशी शामिल थे। टीम जब मौके पर पहुंची तो वहां आजिम पुत्र अजमल शेख, निवासी मथुरा मौजूद मिला।
पूछताछ में आजिम ने बताया कि क्लीनिक उसके भाई शेख अजहर अली के नाम पर संचालित है और उसका भाई खुद को एमबीबीएस डॉक्टर बताता है। लेकिन मौके पर ऐसी कोई वैध चिकित्सकीय डिग्री या पंजीयन प्रस्तुत नहीं किया जा सका, जिससे उसके चिकित्सक होने की पुष्टि हो सके।
बोर्ड पर डॉक्टर, कागजों में कौन?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी व्यक्ति के पास वैध चिकित्सकीय योग्यता और पंजीयन नहीं था तो वह कथित तौर पर गुप्त रोग विशेषज्ञ के नाम से क्लीनिक कैसे चला रहा था? क्लीनिक में इलाज के नाम पर मरीजों को दवाइयां और इंजेक्शन दिए जाने तथा फीस वसूले जाने की बात भी सामने आई है। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जांच के बाद क्लीनिक को सील कर दिया।सीएमएचओ डॉ. संजय ऋषीश्वर के अनुसार जांच रिपोर्ट के आधार पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ सिटी कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराने के लिए आवेदन दिया गया है।
कार्रवाई हुई, लेकिन सवाल स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर भी
यह मामला केवल एक कथित फर्जी क्लीनिक के पकड़े जाने तक सीमित नहीं है। इसके साथ स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा होता है। शहर के प्रमुख इलाके में बाकायदा बोर्ड लगाकर यदि कोई व्यक्ति चिकित्सकीय सेवाएं देने का दावा कर रहा था तो विभाग की निगरानी टीम को इसकी जानकारी पहले क्यों नहीं हुई? यह भी जांच का विषय है कि यह क्लीनिक कब से संचालित था, कितने मरीज यहां इलाज के लिए पहुंचे, उनसे कितनी फीस ली गई और उन्हें कौन-कौन सी दवाइयां या इंजेक्शन दिए गए।
शिकायत पहले पहुंची थी या नहीं, यह भी जांच का विषय
यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि इस क्लीनिक की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को इससे पहले दी गई थी या नहीं। यदि पहले कोई शिकायत या सूचना विभाग तक पहुंची थी तो उस पर क्या कार्रवाई की गई, यह भी जांच का विषय होना चाहिए।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी में यह प्रमाणित नहीं है कि स्वास्थ्य विभाग को पहले से शिकायत मिली थी या किसी अधिकारी ने जानबूझकर कार्रवाई नहीं की। इसलिए इस पहलू की स्वतंत्र जांच जरूरी है। सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि झोलाछापों पर कार्रवाई अक्सर शिकायत, दबाव या किसी गंभीर घटना के बाद ही क्यों दिखाई देती है?
झोलाछापों पर कार्रवाई के लिए क्या किसी हादसे का इंतजार?
स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई का एक पैटर्न लंबे समय से सवालों के घेरे में रहता है-जब तक कोई शिकायत सामने न आए, मामला सुर्खियों में न आए या किसी मरीज की तबीयत बिगड़ने जैसी गंभीर घटना न हो जाए, तब तक कई संदिग्ध क्लीनिकों पर निगरानी कितनी प्रभावी रहती है?
इस मामले में राहत की बात यह है कि कलेक्टर तक सूचना पहुंचने के बाद कार्रवाई हुई और क्लीनिक सील कर दिया गया। लेकिन असली सवाल अब यह है कि क्या सिर्फ इस एक क्लीनिक को सील करने से जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी या शहर में संचालित ऐसे अन्य संदिग्ध क्लीनिकों की भी व्यापक जांच होगी?
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