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संजोग पर भारी समीकरण:राजे से जो लडा उसे पार्टी छोडनी पडी, अब सिद्धार्थ की......... | SHIVPURI NEWS

एक्सरे ललित मुदगल शिवपुरी। शब्दकोश में सजोंग एक ऐसा शब्द है जिसके कई मायने होते हैं। शिवपुरी की राजनीति में अब लडाई संजोग और समीकरण की हो रही है। संजोग यह है कि यशोधरा राजे सिंधिया से शिवपुरी विधानसभा से जो भी प्रत्याशी कांग्रेस से लडा उसे अपनी पार्टी छोडनी पडी हैं, लेकिन जानकारो को कहना है कि यह परिस्थती वश बने राजनीतिक समीकरणो के कारण हुआ हैं। अब सवाल यह है कि यह सजोंग या समीकरण यशोधरा से रिकार्ड मतो से हार चुके कांग्रेस प्रत्याशी सिद्धार्थ लढा के लिए भी यह बनेंगें। 

जैसा कि विदित हैं कि शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र यशोधरा राजे सिंधिया की कर्मस्थली है और उन्होंने 1998 में अपना पहला चुनाव इसी सीट से लड़ा था। तब उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी हरिबल्लभ शुक्ला को 6500 मतों से पराजित किया था। राजनीतिक पंडितो का कहना है कि उस समय हरिबल्लभ शुक्ला अपने आप को कांग्रेस में उपेक्षित महसूस कर रहे थे और भाजपा ने उन्है अपने टिकिट पर लोकसभा का चुनाव लडाया ओर कोई बडा लालच दिया होगा,इस कारण ऐसा फैसला लिया होगा,उस समय हरिबल्लभ शुक्ला के साथ ऐसे समीकरण बन रहे होगेें,या उन्है लगता होगा कि भाजपा में उनका भविष्य ज्यादा श्योर होगा। हलाकि ऐसा हुआ नही ओर अब वे पुन:कांग्रेस में है और उनके घर सिंधिया सरकार का झण्डा हैं। 

यशोधरा राजे सिंधिया ने यहां से दूसरा चुनाव 2003 में लड़ा तब उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी गणेश गौतम को 25 हजार से अधिक मतों से पराजित किया। इसके बाद राजे ने ग्वालियर से लोकसभा का चुनाव लडा ओर शिवपुरी में उपचुनाव हुए। इस चुनाव में शिवपुरी की सबसे बडा उल्टफेर हुआ। कांग्रेस के नही महल के मजबूत सिपाही गणेश गौतम को भाजपा ने शिवपुरी विधानसभा से टिकिट थमा दिया। 

हालाकि गणेश गौतम वीरेन्द्र रघुवंशी से चुनाव हार गए थे। इसके बाद गणेश गौतम जनशक्ति से शिवपुरी विधानसभा का चुनाव लडा। इसके बाद सिंधिया सरकार के झण्डे के नीचे आकर खडे हो गए। अब इसे क्या कहेंगें संजोग या समीकरण। संजोग तो नही कह सकते क्यो कि उपचुनाव के समय प्रदेश में भाजपा का शासन था। कहा जाता है कि उपचुनाव में सत्ता चुनाव नही हारती,शायद यही गणित गणेश जी को प्रभावित कर गया और उन्होने भाजपा की ओर से फैका गया टिकिट लपक लिया। 


राजे ने अपना तीसरा चुनाव 2013 में लड़ा जब उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी वीरेन्द्र रघुवंशी को 11 हजार मतों से पराजित किया। इसके बाद वीरेन्द्र रघुवंशी ने भी भाजपा का दामन थाम लिया। राजनीतिक क्षेत्र भी बदल लिया। फिर बात वही आ रही हैं सजोंग या समीकरण। राजनीतिक पंडितो का कहना है कि वीरेन्द्र की बयान वाजी के कारण ही उन्है पार्टी छोडनी पडी और उन्होने भाजपा का हाथ थमा। 

हालाकि वीरेन्द्र रघुवंशी ने सामन्य कार्यकर्ता की हैसियत से भाजपा में शामिल हुए। शिवपुरी विधानसभा को छोड कोलारस विधानसभा से अपना  अपना भविष्य तलाशने लगे। हालाकि इसमें वह सफल भी हुए हैं।  

 यशोधरा राजे सिंधिया ने तीन चुनावों में जिन-जिन को भी पराजित किया है उन्होंने पार्टी छोड़ दी और पार्टी छोडऩे के बाद दो हरिबल्लभ शुक्ला और वीरेन्द्र रघुवंशी तो अन्य दलों से विधायक भी बन गए, लेकिन गणेश गौतम दो बार चुनाव लड़े और दोनों ही बार हार गए। 

यशोधरा राजे से चुनाव लड़े हरिबल्लभ शुक्ला, गणेश गौतम और वीरेन्द्र रघुवंशी के पार्टी छोडऩे के बाद अब यह सवाल भी उठता है कि कहीं 2018 के चुनाव में उनके हाथों पराजित सिद्धार्थ लढ़ा भी कांग्रेस को अलविदा तो नहीं कह देंगे। हालांकि हाल के सिंधिया दौरे में सिद्धार्थ लढ़ा को कम महत्व मिला और वे उपेक्षित बने रहे। अब यह कह सकते है कि संजोग पर भारी है समीकरण।  

माधवचौक पर सडक़ों के लोकार्पण के अवसर पर आयोजित आमसभा में सिंधिया की उपस्थिति में पार्षद इस्माइल खान से लेकर पूर्व विधायक गणेश गौतम, शहर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राकेश गुप्ता, सांसद प्रतिनिधि हरवीर सिंह रघुवंशी को बोलने का मौका मिला। हालांकि जिला कांग्रेस अध्यक्ष बैजनाथ सिंह यादव, नपाध्यक्ष मुन्नालाल कुशवाह और उपाध्यक्ष अन्नी शर्मा भी बोले, लेकिन स्टेज पर होने के बाद भी सिद्धार्थ उपेक्षित बने रहे। 
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