कलेक्टर ने मीडिया से कहा: पेट पर पट्टी बंधकर लोकतंत्र की रक्षा करो

shailendra gupta
शिवपुरी। मोटी तनख्वाह, बड़ा बंगला, लक्झरी कार और तमाम सरकारी सुविधाएं भोगने वाले कलेक्टर आरके जैन ने मीडिया को खाली पेट लोकतंत्र की रक्षा का पाठ पढ़ाया। वो चाहते हैं कि तीज त्यौहार और चुनावों में मीडिया को मिलने वाली आर्थिक सहायता भी बंद हो जाए।

कलेक्टर आर.के.जैन ने आगामी विधानसभा निर्वाचन 2013 को दृष्टिगत रखते हुए भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार स्वतंत्र व निष्पक्ष निर्वाचन संपन्न कराने हेतु जिले में की गई तैयारियों तथा मतदाताओं की स्वतंत्र सोच को प्रभावित करने वाली 'पेड न्यूज' के संबंध में मीडिया प्रतिनिधियों से विस्तार से चर्चा की। कलेक्टर श्री जैन ने कहा कि निष्पक्ष व स्वतंत्र मतदान के लिए आवश्यक है कि मतदाता अपने मताधिकार का उपयोग स्वविवेक से करें, उसकी सोच व निर्णय को बाहरी तत्वों द्वारा प्रभावित न किया जा सकें। इसी उद्देश्य से भारत निर्वाचन आयोग द्वारा पेड न्यूज पर अंकुश लगाने का प्रयास किया जा रहा है।

जिसके लिए जिला स्तर पर मीडिया सर्टिफिकेशन एण्ड मॉनीटरिंग कमेटी का गठन वरिष्ठ प्रेस प्रतिनिधियों को सम्मलित करते हुए किया गया है। उन्होंने कहा कि मीडिया द्वारा एक तरफा विशलेषण या खबरों को इसकी श्रेणी में सम्मलित किया जा सकता है, जिसे विज्ञापन मानते हुए संबंधित प्रत्याशी को नोटिस जारी कर उसके चुनाव खर्च में सम्मलित किया जावेगा। उन्होने मीडिया प्रतिनिधियों से भी संयमित व संतुलित खबर जारी करने की अपेक्षा की।

कुल मिलाकर कलेक्टर निर्वाचन आयोग का डर दिखाकर यह अपेक्षा रखते हैं कि मीडिया वही छापे जो प्रशासन चाहता है। वो मीडिया को समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि समीक्षा या विष्लेषण विज्ञापन की श्रेणी में माने जाएंगे। सवाल यह उठता है कि मानना है तो मानते रहिए, इससे मीडिया को क्या। आपका मन करे तो प्रत्याशी के खर्चो में कुछ भी जोड़ दो, मीडिया को घड़ी घड़ी डराने की कोशिश क्यों की जा रही है। आदर्श आचरण संहिता और चुनाव आयोग के तमाम नियम प्रत्याशियों और सरकारी कर्मचारियों पर लागू होते हैं, मीडिया पर नहीं, मीडिया स्वतंत्र है और उसे स्वतंत्र ही रहने दिया जाना चाहिए, फिर चाहे वो सर्वे करे या विष्लेषण। हर मीडियम के अपने केल्कूलेशन होते हैं, उन्हें उसी अनुसार चलने दिया जाना चाहिए।

यहां याद दिलाना मुनासिब होगा कि शासन या प्रशासन केवल उन्हीं संस्थाओं के कार्य करने की नीति और नियम तय कर सकते हैं जिन्हे वो अनुदान देते हैं। मीडिया प्रशासन के टुकड़ों पर पलने वाला एनजीओ नहीं है। अत: उसे नियंत्रित कर भारतीय संविधान की धारा 4 का उल्लंघन करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। 

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