पोहरी में अनेक दावेदार कांग्रेस टिकिट के प्रति आश्वस्त

shailendra gupta
शिवपुरी। एक साल पहले पोहरी में पूर्व विधायक हरिवल्लभ के पक्ष और विपक्ष में अनुशासनहीनता की हद तक घमासान प्रारंभ हो गया था। हरिवल्लभ के विरोधियों ने लामबंद होकर एक मोर्चे का गठन कर लिया था। हरिवल्लभ समर्थकों ने भी विरोधियों की तरह भोज राजनीति की शुरूआत कर दी थी। लेकिन पार्टी आला कमान की फटकार के पश्चात यह मुहिम थम अवश्य गई। लेकिन भीतर ही भीतर शीत युद्ध चलता रहा।

फिलहाल पोहरी में तूफान से पहले की शांति नजर आ रही है और ऐसी आशंका है कि यह कभी भी समाप्त होकर आमने-सामने के संघर्ष में तब्दील हो सकती है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पोहरी में कांगे्रस टिकिट के प्रति अनेक दावेदार पूरी तरह आश्वस्त हैं और सपनों का महल जब टूटेगा तो बात इतनी आसान नहीं रहेगी।

पिछले चुनाव का इतिहास देखें और उससे आंकलन लगाएं तो पोहरी में कांग्रेस के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ अलग है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांगे्रस की इसलिए बुरी तरह पराजय हुई, क्योंकि पार्टी के उम्मीदवार को डमी कहकर प्रचारित किया गया था। उस चुनाव में हरिवल्लभ शुक्ला बहुजन समाज पार्टी से मैदान में उतरे थे और दूसरे स्थान पर रहे थे। आज हरिवल्लभ कांग्रेस के साथ हैं। इस संदर्भ में पोहरी में कांग्रेस की चुनौती को एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता। इस विधानसभा क्षेत्र में जातिगत समीकरण प्रभावी रहे हैं और टिकिट की दौड़ में कांग्रेस तथा भाजपा में धाकड़ और ब्राह्मण उम्मीदवार शामिल रहे हैं।

अक्सर यदि एक दल ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकिट देता है तो दूसरा दल धाकड़ उम्मीदवार पर दाव लगाता है। इलाके में धाकड़ मतदाताओं की संख्या लगभग 30 हजार है और ब्राह्मण मतदाता भी 15 से 20 हजार की तादाद में हैं। यह आंकड़ा इसलिए संतुलित हो जाता है, क्योंकि बहुसंख्यक धाकड़ जाति के विरोध में अन्य जातियां ब्राह्मण उम्मीदवार का समर्थन कर देती हैं। हालांकि पिछले चुनाव में ऐसा नहीं था। तब हरिवल्लभ विरोध के स्वर इतने बुलंद थे कि धाकड़ उम्मीदवार प्रहलाद भारती के नेतृत्व में अन्य जातियां एकजुट हो गई थीं। पोहरी में दो मौके ऐसे भी आए जब दोनों दलों ने एक ही जाति के प्रत्याशी पर दाव लगाए। इस विधानसभा क्षेत्र का अभी तक का इतिहास रहा है कि कोई प्रत्याशी दूसरी बार नहीं जीता।

इस मायने वर्तमान विधायक प्रहलाद भारती खतरे में नजर आते हैं, लेकिन इतिहास के साथ एक बात और रहती है कि कभी न कभी तो यह बदला जाता है। इसी से श्री भारती आशांवित हैं। लेकिन कांग्रेसी इसे मानने को तैयार नहीं हैं। वे धाकड़ समाज में उनसे नाराजी को प्रचारित कर रहे हैं। यदि प्रहलाद भारती का टिकिट यथावत् रहा तो कांग्रेस पहली प्राथमिकता ब्राह्मण उम्मीदवार को देगी ऐसी संभावना है। कांग्रेस में जिस तरह से हरिवल्लभ को महत्व मिला है उससे टिकिट की कतार से उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। पिछले चुनाव में पराजित एनपी शर्मा भी टिकिट के लिए आश्वस्त दिख रहे हैं। स्व. गौतम शर्मा परिवार से उनकी पुत्रवधु श्रीमती निर्मला शर्मा और उनके देवर देववृत भी टिकिट की कतार में हैं।

उन्हें श्री सिंधिया पर नहीं बल्कि पार्टी आला कमान पर भरोसा है। सिंधिया खेमे में कर्मचारी नेता राजेन्द्र पिपलौदा भी लाइन में खड़े नजर आ रहे हैं। ब्राह्मण सम्मेलन की सफलता से उनका उत्साह बढ़ा है। जबकि युवक कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष विजय शर्मा राहुल बिग्रेड की तरफ से अपने टिकिट के प्रति पूरी तरह आश्वस्त हैं। धाकड़ उम्मीदवारों में जिला कांगे्रस पदाधिकारी सुरेश धाकड़, ब्लॉक कांगे्रस के पूर्व अध्यक्ष विनोद धाकड़, पूर्व विधायक जगदीश वर्मा और उनके पुत्र प्रद्युम्र वर्मा आदि को पूरा-पूरा भरोसा है कि टिकिट उन्हें ही मिलेगा। लेकिन दिक्कत यह है कि टिकिट किसी एक को ही मिल सकता है और ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए पोहरी में सब कुछ ठीक-ठाक रहेगा। यह कहना बहुत मुश्किल है।

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