Shivpuri News: मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर छत्रपाल प्रजापति की नियुक्ति हाईकोर्ट के ओदश से निरस्त

Lalit Mudgal
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शिवपुरी।
श्रीमंत विजयाराजे सिंधिया मेडिकल कॉलेज शिवपुरी में करीब आठ साल पहले हुई एक नियुक्ति पर हाईकोर्ट ग्वालियर ने बड़ा फैसला सुनाया है। कम्युनिटी मेडिसिन विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्त डॉ. छत्रपाल प्रजापति की नियुक्ति को हाईकोर्ट ने नियमों के विपरीत मानते हुए निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे तत्काल प्रभाव से सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्य करना बंद करें।

यह फैसला ऐसे समय आया है, जब मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की नियुक्तियों में निर्धारित शैक्षणिक योग्यता और अनुभव को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इस मामले में हाईकोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड और लागू नियमों का परीक्षण करने के बाद नियुक्ति को ही अवैध करार दिया।

जून 2018 में एमडी, अगस्त में सहायक प्राध्यापक
मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी डॉ. प्रजापति की एमडी डिग्री और नियुक्ति के बीच का बेहद कम अंतर है। रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने जून 2018 में एमडी की परीक्षा उत्तीर्ण की थी, जबकि महज करीब दो महीने बाद 20 अगस्त 2018 को उन्हें सहायक प्राध्यापक नियुक्त कर दिया गया।
नियुक्ति को चुनौती देने वाले डॉ. मनबहादुर राजपूत की ओर से हाईकोर्ट में तर्क दिया गया कि जिस पद पर डॉ. प्रजापति की नियुक्ति की गई, उसके लिए निर्धारित न्यूनतम योग्यता और अनुभव उनके पास नहीं था। इसी आधार पर नियुक्ति को चुनौती दी गई थी।

चार साल के अनुभव की शर्त बनी नियुक्ति की सबसे बड़ी कड़ी
मामले में लागू Minimum Qualifications for Teachers Regulations, 2017 को हाईकोर्ट के सामने रखा गया। इन नियमों के अनुसार सहायक प्राध्यापक पद के लिए संबंधित विशेषज्ञता में एमडी/एमएस के साथ निर्धारित रेजिडेंसी अनुभव भी जरूरी था। कोर्ट के सामने रिकॉर्ड से यह बात सामने आई कि डॉ. प्रजापति ने जून 2018 में ही एमडी पूरी की थी। ऐसे में अगस्त 2018 में सहायक प्राध्यापक नियुक्ति के समय उनके पास नियमों के मुताबिक आवश्यक अनुभव होना संभव नहीं था। यही बिंदु नियुक्ति के खिलाफ मामले का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना।

सीनियर रेजिडेंट का पद नहीं था’ वाली दलील भी नहीं चली
नियुक्ति का बचाव करते हुए शासन और मेडिकल कॉलेज प्रबंधन की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2018 में कम्युनिटी मेडिसिन विभाग में सीनियर रेजिडेंट का पद उपलब्ध ही नहीं था, इसलिए संबंधित अनुभव प्राप्त करना संभव नहीं था। हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2017 में ही संबंधित विभाग में सीनियर रेजिडेंट के पद मौजूद होने के प्रमाण सामने आए थे। कोर्ट ने शासन और कॉलेज प्रबंधन की इस दलील को असत्य, तुच्छ, आधारहीन और भ्रामक माना। इससे नियुक्ति के पक्ष में दिए गए तर्क को बड़ा झटका लगा।

कोर्ट ने कहा- सार्वजनिक पद पर योग्यता सबसे जरूरी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी याचिका में मुख्य सवाल यह होता है कि क्या कोई व्यक्ति सार्वजनिक पद पर निर्धारित योग्यता पूरी किए बिना बैठा है या नहीं। इसमें यह तथ्य निर्णायक नहीं है कि याचिका दायर करने वाला व्यक्ति स्वयं उस पद के लिए योग्य है या नहीं। अदालत का फोकस नियुक्त व्यक्ति की पात्रता और सार्वजनिक पद पर उसकी वैध नियुक्ति पर रहता है।

आठ साल बाद नियुक्ति पर फैसला
डॉ. प्रजापति की नियुक्ति 20 अगस्त 2018 को हुई थी और इसे चुनौती देने वाली कानूनी लड़ाई के बाद अब 31 जुलाई 2026 को हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अपना फैसला सुनाया। जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डबल बेंच ने रिट अपील क्रमांक डब्ल्यूए 1304/2015, डॉ. मनबहादुर राजपूत बनाम मध्यप्रदेश शासन मामले में फैसला सुनाते हुए नियुक्ति को निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता गौरव समाधिया ने पैरवी की।

अब तत्काल पद छोड़ना होगा
हाईकोर्ट के फैसले के बाद डॉ. छत्रपाल प्रजापति की सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति कायम नहीं रहेगी। अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिए हैं कि वे तत्काल प्रभाव से उक्त पद पर कार्य करना बंद करें। इस फैसले के बाद शिवपुरी मेडिकल कॉलेज में फैकल्टी नियुक्तियों की प्रक्रिया और निर्धारित योग्यता के पालन को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।

दो अन्य डॉक्टरों की नियुक्तियां भी सवालों के घेरे में
मामला यहीं खत्म नहीं होता। शिवपुरी मेडिकल कॉलेज के दो अन्य चिकित्सकों के खिलाफ भी योग्यता को लेकर याचिकाएं लंबित बताई गई हैं। इनमें स्त्री रोग विभाग की डॉ. शिखा जैन और दंत रोग विभाग के डॉ. मोहित शर्मा शामिल हैं। इन मामलों में भी नियुक्ति के दौरान निर्धारित योग्यता से जुड़े सवाल न्यायालय के समक्ष उठाए गए हैं। ऐसे में डॉ. प्रजापति की नियुक्ति निरस्त होने के बाद इन लंबित मामलों पर भी मेडिकल कॉलेज प्रशासन और संबंधित चिकित्सकों की नजर बनी हुई है।

नियुक्तियों की पारदर्शिता पर फिर उठे सवाल
हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक नियुक्ति तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और नियमों के पालन पर भी सवाल खड़े हुए हैं।

सहायक प्राध्यापक जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति के लिए जब न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता और अनुभव स्पष्ट रूप से निर्धारित हो, तो उसका पालन होना जरूरी है। शिवपुरी मेडिकल कॉलेज के इस मामले में अदालत के फैसले ने इसी सवाल को केंद्र में ला दिया है कि क्या नियुक्ति के समय नियमों की पूरी तरह जांच की गई थी? फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश के बाद डॉ. छत्रपाल प्रजापति की नियुक्ति निरस्त हो चुकी है और उन्हें तत्काल पद छोड़ने के निर्देश दिए गए हैं। अब यह फैसला मेडिकल कॉलेज में आगे होने वाली नियुक्तियों और लंबित मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है।

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