शिवपुरी, जिंदा लोगों को पड़ती है 4 कंधों की जरूरत, आजादी के 80 साल, 1 हैंडपंप तक नहीं लगा

Lalit Mudgal
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शिवपुरी। हम आजादी का जश्न मना रहे हैं। देश डिजिटल युग से एआई तक पहुंच गया है, लेकिन 14 अगस्त को शिवपुरी जिले में दिए गए एक आवेदन पर गौर करें तो लगता है कि अभी भी जंगल युग ही चल रहा है। नरवर तहसील के अंतर्गत आने वाली एक पंचायत के गांव में निवास करने वाले लोग आज भी ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं, मानो देश आजाद ही न हुआ हो। इस गांव में मानसून काल में सिस्टम की बेरुखी और प्रकृति इस छोटे से गांव को बंधक बना लेती है।

नरवर तहसील की सीहोर पंचायत में आने वाले गांव चरखाई में स्कूल, आंगनबाड़ी, सड़क, बिजली आजादी के 80 साल बाद भी नहीं पहुंची है। वोट मांगने वाले नेता इस गांव में एक हैंडपंप तक नहीं लगवा पाए। मानसून काल में अगर कोई इस गांव का व्यक्ति बीमार हो जाए तो उसे जिंदा ही चार कंधों की आवश्यकता होती है। उसे चारपाई पर लेटाकर पैदल 3 किलोमीटर तक धान के पानी भरे खेतों से सड़क तक लाया जाता है। करैरा एसडीएम को सौंपे गए आवेदन में शिकायत नहीं, ग्रामीणों ने एक सवाल पूछ लिया। लगता है कि देश आजाद ही न हुआ हो, या तो हमारी समस्याएं सुलझाओ, या फिर कह दो कि हम भारत के नागरिक ही नहीं हैं!

सीहोर गांव से मात्र 3 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव है चरखाई। इस गांव में 20 परिवार निवास करते हैं। सीहोर गांव से इस गांव के लिए एक पुरानी और कच्ची सड़क जाती है, लेकिन गांव और मुख्य सड़क के बीच एक बरसाती नाला पड़ता है, जिस पर पुल नहीं होने के कारण रास्ता अवरुद्ध हो जाता है। इस नाले में खेतों के साथ-साथ बरसात का पानी बहता है। नाले में पानी होने के कारण इस गांव से सड़क मार्ग कट जाता है। आवागमन रुक जाता है। सीहोर गांव में निवास करने वाले रामनिवास फौजी ने इस गांव के विकास के लिए कई बार प्रशासन को आवेदन दिया है।

14 अगस्त को रिटायर्ड फौजी ने इस गांव को लेकर आवेदन दिया और पूछ लिया कि यह गांव आजाद हुआ है कि नहीं। फौजी ने बताया कि पास से सिंध नदी का प्रवाह है, इस कारण धान की खेती होती है। चरखाई जाने के लिए रास्ते में पड़ने वाला नाला रास्ता रोक लेता है। धान की खेती होने के कारण खेतों में कम से कम 2 फुट पानी भरा होता है। इस गांव में कोई बीमार हो जाता है तो उसे चारपाई पर 3 किलोमीटर इन पानी से भरे खेतों से लाना पड़ता है। काली मिट्टी वाले इन पानी भरे खेतों से पैदल चलना एक टास्क से कम नहीं होता है।

स्कूल नहीं है, बिजली का प्रवेश नहीं हुआ है
गांव में न तो सड़क है और न ही कोई स्कूल। इस नाले पर पुलिया नहीं होने के कारण शिक्षा की चाह में मासूम बच्चों को रोज अपनी जान जोखिम में डालकर और कपड़े गीले करके नाला पार कर दूसरे गांव जाना पड़ता है। सड़क न होने के कारण गांव वाले कोई वाहन भी नहीं खरीद पाते। ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी घने जंगल के आदिवासियों जैसी जिंदगी गुजार रहे हैं। वहीं, बिजली नहीं होने के कारण विकास से कोसों दूर हैं। ग्रामीणों के पास बिजली से चलने वाले उपकरण भी नहीं हैं। बिजली नहीं होने के कारण लोग जंगल जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं।

पानी का एक हैंडपंप भी नहीं है
आजादी के 80 वर्ष बाद विकास की स्पीड पकड़ी नहीं जा रही है, लेकिन यहां अभी तक जिम्मेदार अधिकारी और नेता एक हैंडपंप भी लगवा नहीं सके हैं। लोग सबसे अधिक परेशान मानसून काल में होते हैं। गांव के समीप लगे खेतों में लगे ट्यूबवेल से पीने का पानी आता है। अगर दिन में लाइट आती है तो पानी मिल जाता है, लेकिन रात में लाइट आती है तो फिर लोगों को 1 किलोमीटर दूर स्थित एक कुएं से पीने का पानी लाना पड़ता है। मानसून काल में इस कुएं का पानी भी पीने योग्य नहीं होता है। इस कारण लोगों को मानसून काल में शुद्ध पीने का पानी नहीं मिलता है।

मौत के बाद भी नहीं है सम्मान
इस गांव की सबसे रुला देने वाली हकीकत यह है कि यहां कोई श्मशान घाट नहीं है। अगर बारिश के मौसम में किसी ग्रामीण की मृत्यु हो जाए तो परिवार को बारिश रुकने का इंतजार करना पड़ता है। अपनों को खोने के दुख के बीच खुले आसमान के नीचे मजबूरी में अंतिम संस्कार करना सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है।

हम भी वोट देते हैं, हम भी सरकार बनाते हैं
एसडीएम करैरा को सौंपे गए ज्ञापन के अंत में ग्रामीणों ने जो लिखा है, वह लोकतंत्र के हर ठेकेदार को सोचने पर मजबूर कर देगा। ग्रामीणों का कहना है कि हम भी लोकतंत्र का हिस्सा हैं, वोट डालते हैं और सरकारें बनाते हैं। तो क्या हमारा यह हक नहीं बनता कि हमें बिजली, पानी, शिक्षा, सड़क और श्मशान जैसी मूलभूत सुविधाएं मिलें?

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