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मैं ईश्वरवादी और भाग्यवादी हूं यह मेरा प्रारब्ध है जो मुझे इतना सम्मान मिला : डॉ. विरही | Shivpuri News

शिवपुरी। न मैं माक्र्सवादी हूं न मैं समाजवादी हूं मैं तो विशुद्ध रूप से ईश्वरवादी और भाग्यवादी हूं। यह मेरा भाग्य ही था जो मुझे शिवपुरी लेकर आया और यह मेरा प्रारब्ध है जो मुझे इतना सम्मान शिवपुरीवासियों ने दिया। उक्त उदगार देश के जाने माने साहित्यकार और विचारक डॉ. परशुराम शुक्ल विरही ने अपने 91वें जन्मदिवस पर आयोजित सम्मान समारोह में व्यक्त किए। 

शहर के बुद्धिजीवियों और गणमान्य नागरिकों द्वारा आयोजित इस समारोह में वक्ताओं ने उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों को बेहद खूबसूरती से रेखांकित किया और उनकी बौद्धिकता से लेकर हार्दिकता तक की भूरि-भूरि तारीफ की और कहा कि दिमाग और ह्दय का सम्मिश्रण ही उन्हें महान व्यक्तियों की कतार में ला खड़ा करता है। आयोजन के प्रारंभ में आयोजकों ने डॉ. विरही का शॉल, श्रीफल और पुष्पहार तथा गुलाल लगाकर सम्मान किया तथा उनके दीर्घायु जीवन की कामना की। 

शिवपुरी में आधा दशक से भी अधिक समय गुजार चुके डॉ. विरही के सम्मान समारोह में उनके समकक्ष सहित्यकार से लेकर शिष्यगण, राजनेता और पत्रकार भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। सम्मान समारोह में पत्रकार प्रमोद भार्गव ने अपने उदबोधन में कहा कि डॉ. विरही की साहित्य के साथ साथ धर्म, विज्ञान, इतिहास, भूगोल और दर्शन में भी गहन पकड़ थी। शिवपुरी में सभी क्षेत्रों का उनसे बड़ा विशेषज्ञ विद्वान कोई दूसरा नहीं है। श्री भार्गव ने डॉ. विरही द्वारा लिखित उपन्यास प्रथ्वी सिंह आजाद की चर्चा करते हुए कहा कि लघु उपन्यासों की श्रेणी में उक्त उपन्यास श्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है। 

जिसमें डॉ. विरही ने अपनी लेखनी से अंत तक रोचकता बनाए रखी है। हालांकि रोचकता कायम करने के लिए उन्होंने काल्पनिक घटनाओं और पात्रों का भी सृजन किया है। यह उनकी सृजनात्मकता क्षमता का प्रतीक उपन्यास है। बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष डॉ. अजय खेमरिया ने स्मरण करते हुए बताया कि जब वह बनारस गए और उन्हें वहां कुछ लोगों से मुलाकात हुई जिनमें से एक ने पूछा कि आप कहां के रहने वाले हो जब मैंने शिवपुरी का नाम लिया तो वह बोल पड़े कि क्या डॉ. विरही वाली शिवपुरी? 

श्री खेमरिया ने कहा कि उस समय मुझे आश्चर्यचकित प्रसन्नता का एहसास हुआ कि डॉ. विरही जैसे सह्दय और बुद्धिजीवी व्यक्ति के नाम से मेरी शिवपुरी जानी जा रही है। उन्होंने अपनं संबोधन में डॉ. विरही को आचार्य विरही कहकर संबोधित किया और कहा कि उन जैसे पात्र व्यक्तित्व के लिए आचार्य शब्द ही उपयुक्त है। राजनेता श्री प्रकाश शर्मा ने अनूठे ढंग से डॉ. विरही के व्यक्तित्व का चित्रण किया। 

उन्होंने कहा कि डॉ. विरही मानसिक श्रम के पर्याय हंै। मैंने उन्हें कभी भी शारीरिक श्रम करते नहीं देखा, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने इतनी लंबी आयु पाई है तो इसका एकमात्र कारण यह है कि शब्द सृजन उनकी जिजीविषा है। साहित्य और विचार उनमें ऊर्जा का संचार करते हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. एचपी जैन ने डॉ. विरही के गीतों में रागात्मकता का चित्रण किया। उन्होंने स्वीकार किया कि डॉ. विरही जैसे साहित्य के विशाल भण्डार को खंगालना मेरे जैसे अल्पबुद्धि व्यक्ति के लिए अत्यंत ही दुष्कर कार्य है। उन्होंने अपने वक्तवय में डॉ. विरही की तीन पुस्तकों अपना-अपना सच, अमर होते हैं स्वर और अपने हिस्से के उजाले की कविताओं का विस्तार से जिक्र किया। 

जब उन्होंने डॉ. विरही की कविता का गायन करते हुए कहा कि सीखा नहीं जाता प्रेम सिखा जाता है। प्रेम पर किताबों को लिखकर क्या होता है प्रेम कागज पर नहीं दिल पर लिखा जाता है तो तालियोंं की गडग़ड़ाहट से हॉल गूंज उठा। उन्होंने डॉ. विरही की किसको कैसे बहलाना है कोई तुमसे सीखे, अलकें खोल बांध लेना कोई तुमसे सीखे, और जादूगर की तरह करिश्मा करना आता तुमको घायल कर दो घाव न दीखे कोई तुमसे सीखे का भी जिक्र किया। वक्ताओं में काफी तैयारी के साथ दिनेश वशिष्ठ ने डॉ. विरही के काव्य में आधुनिक भावबोध का जिक्र किया और कहा कि डॉ. विरही वर्तमान को ही आधुनिक मानते है और यही सच्चाई है। 

डॉ. पदमा शर्मा ने डॉ. विरही की कहानियों पर दृष्टिपात किया। इसके अलावा डॉ. पुरूषोत्तम गौतम, डॉ. लखनलाल खरे, अरूण अपेक्षित विजय भार्गव, मुकेश अनुरागी, आशुतोष शर्मा, विनय प्रकाश जैन, राजू बाथम, आलोक शुक्ला आदि ने भी डॉ. विरही के बहुआयामी व्यक्तित्व पर अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रकाश डाला। अंत में जब डॉ. विरही के बोलने की बारी आई तो वह काफी अभिभूत और भावुक थे, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने पूरे तार्किक तरीके से व्याख्या करते हुए कहा कि ज्ञान किताबों में सुलभ नहीं है। 

किताबों में महज सूचनाएं हो सकती हैं, ज्ञान तो अनुभव और जीने से आता है। उन्होंने कहा कि सूचनाओं से अंहकार जबकि ज्ञान से विनम्रता का सृजन होता है और ज्ञान ही अंतत: जीवन के चरम लक्ष्य निर्वाण की ओर व्यक्ति को ले जाती है। कार्यक्रम का स्तरीय संचालन डॉ. लखनलाल खरे ने किया। सम्मान समारोह में पूर्व विधायक हरिवल्लभ शुक्ला, पत्रकार अशोक कोचेटा, भरत अग्रवाल, डॉ. शंकर शिवपुरी, राधेश्याम सोनी, भूपेंद्र विकल, आदित्य शिवपुरी, विनय प्रकाश जैन नीरव, माधुरी शरण द्विवेदी और डॉ. विरही के सुपुत्र पत्रकार अनुपम शुक्ला, वीरेंद्र शर्मा भुल्ले आदि भी उपस्थित थे।