पतन से उत्थान की ओर जाने का नाम तपस्या है: मुनि श्री अजितसागर जी

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शिवपुरी। मानव पर्याय मिलना बहुत दुर्लभ है। बहुत पुण्योदय से यह मानव तन मिलता है, परंतु हम अज्ञानता के वशीभूत होकर विषय-भोगों में इस पर्याय को बर्बाद कर देते हैं। परंतु यह मानव तन यूँ भोगों में बर्बाद करने के लिये नहीं मिला, बल्कि तपस्या के माध्यम से इसे तपाकर अपनी आत्मा का उत्थान करने के लिये मिला हैं। आचार्य ने कहा है कि- ‘‘बिना कष्ट के इष्ट प्राप्ति नहीं हो सकती‘‘। 

जैसे बिना अग्नि में तपाये कोई बस्तु शुद्ध नहीं हो सकती, उसी प्रकार मन से राग-द्वेष रुपी विकृति को दूर करने के लिए, इस शरीर को तपस्या की भट्टी में तपाना होगा तभी हम अपने कर्मों का क्षय करके परमात्म पद को प्राप्त कर सकते हैं। अपनी इक्छाओं का निरोध करना ही तप है, और पतन से उत्थान की ओर जाने का नाम ही तपस्या है। उक्त मंगल प्रवचन स्थानीय महावीर जिनालय पर पूज्य मुनि श्री अजितसागर जी महाराज ने उत्तम-तप धर्म की महिमा पर विशाल धर्म सभा को संबोधित करते हुये दिये।

उन्होनें आगे कहा कि- ख्याति-लाभ-पूजा के लिए संत बनना, तपस्या करना, तप का दुरुपयोग है। सच्चा तपस्वी वही है, जो तन की सत्ता को छोडक़र, आत्मसत्ता को पाने की कोशिश करे। जैन साधु संसार, शरीर और भोगों से दूर रहकर प्रतिपल सजग रहते हुए, निरंतर तप के माध्यम से अपने शरीर को तपाते रहते है, आत्म पद को प्राप्त करने के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं। संसारी प्राणी निरंतर भोगों में लिप्त रहते हुए इस तन की सेवा में ही लगा हुआ हैै। 

यह दुर्लभ मानव पर्याय तन की सेवा के लिए नहीं बल्कि चेतन की सेवा के लिए है। इस जीवन की बर्बादी को रोकना ही तप है। ‘‘इच्छा निरोध: तप:‘‘ इक्क्षाओं का निरोध करते हुए संसार की असारता का चिंतन करते हुए, तप के माध्यम से ही आप अपनी असीम कामनाओं को रोककर, जीवन को सार्थक कर सकते है। जैसे समुद्र कभी नदियों से तृप्त नहीं होता, वैसे ही विषयों की पूर्ति से मन कभी तृप्त नहीं होता।

हम आज मन और तन को तपाकर अपनी आत्मा को शुद्ध बनाते हुए, संसार से उदासीन रहें। जब तक हम अपनी इच्छाओं को नहीं रोकेंगे, तब तक हमारा उत्थान नहीं होगा। तप से एवं तपस्वी संतो से समाज एवं देश का उद्धार होता है, अत: हम देश के विकास में सहयोगी बनकर भोग विलास पूर्ण इच्छाओं का त्याग करें। 

ऐलक श्री दया सागर जी महाराज ने कहा कि कर्म क्षय के लिए जो तप तपा जाए वही तप होता है। अपनी इच्छाओं-भावनाओं को रोकना ही तप है, क्योंकि जब जितना चाहा, वह कभी नहीं मिला। अत: सुख-शांति के साधनों और इच्छाओं का नियमन करना चाहिए। 

धन सबकुछ नहीं है, पर वह धन यदि उपकार में लग जाने से भला कहा है। हम अपने मन को प्रकृति के अनुकूल बनाएं, तो स्वस्थ रहेंगे। तन मिला है तो तप करके पाप कर्म को नाश करें। जैसे खदान से निकला स्वर्ण पाषाण तपने पर ही शुद्ध हो पाता है, उसी प्रकार 12जी पुनीत अपने से आत्मा शुद्ध होती है। 
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