इमरान अली, कोलारस। मध्यप्रदेश में नया शिक्षा सत्र शुरू होने से पहले ही अभिभावकों को अपनी जेब कटने की चिंता सताने लगी है। पहले भारी-भरकम फीस, फिर किताबों समेत पढ़ाई से जुड़े अन्य सामानों की कीमत का बोझ उनके कंधों पर आने वाला है। उधर, बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के माता-पिता के सपने का स्कूल संचालक फायदा उठाने में लगे हुए हैं।
लेकिन पिछने वर्ष कि भांति इस वर्ष भी कोलारस में तमाम स्कूलो ने झूठे वादों के पुटल्ले बनाकर अखबारों के सहारे घरों तक पहुंचा दिये है। कोलारस में निजी स्कूलों की मनमानी अभिबावको के लिए गले कि हडडी बनी हुई यहां के स्कूल शासन के द्वारा लागु नियमों को ठेंगा दिखा कर अपने स्कूलों में फीस और कमीशन के मामलों में कोई गठबंधन नही करते।
अधिकारियों कि कमीशनखोरी और कमाई का है काला खेल
शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अनुसार, सीबीएसई स्कूल केवल एनसीईआरटी पाठ्यक्रम की अनुमोदित पुस्तकों के प्रकाशकों को ही पाठयक्रम में शामिल कर सकते हैं। अन्य निजी स्कूल मध्य प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम और मध्य प्रदेश शिक्षा विभाग से अनुमोदित प्रकाशकों की किताबें लागू कर सकते हैं।
लेकिन कहा जाता है कि अकसर पाबंदी ही बगावत कि शुरूआत होती है। हर वर्ष निजी स्कूलों के संचालक नियम विरुद्ध बच्चों के बस्तों का बोझ बढ़ा देते हैं। जो बगावत कि शुरूआत है। इसमें ऐसी कई किताबें होती हैं, जो बच्चों के लिए उपयोगी नहीं होतीं, लेकिन कमीशन के चक्कर में इन्हें पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया जाता है। इस तरह बच्चों के बस्ते का बोझ घटने की बजाय बढ़ रहा है। इस पर रोक लगाने के लिए षासन प्रषासन कोई कठोर कदम उठाने को तैयार नही है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम में कई प्रावधान किए गए हैं, लेकिन इन पर अमल नहीं हो रहा है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम में निजी स्कूल केवल वही किताबें स्कूलों में चला सकते हैं, जो एनसीईआरटी और मप्र पाठ्य पुस्तक निगम से अनुमोदित हों।
जबकि कई निजी स्कूल एक-एक विषय की कई किताबें बता देते हैं। दूसरी तरफ जिला शिक्षा विभाग ने नए सत्र में किताबों की कमीशनबाजी के खेल को खत्म करने के लिए अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। यदि अभी से विभाग नहीं चेता तो इस बार फिर से पुराना खेल शुरू हो जाएगा।
इन स्कूल संचालकों की मनमानी पर रोक नहीं लग पाएगी। यह सारा खेल अधिकारियो कि कमीशनखोरी चल रहा है। यहां न तो कोई अधिकारी न तो नीजी स्कूलो का निरिक्षण करता न ही किसी तरह कि कार्यवाही 22.06.2016 को चाईल्ड जोन स्कूल कोलारस पर आरटीई एक्ट के तहत हुए दाखिलो में अभिवावको से अवैध रूप से वसूले गए 68950 रूपए के मामले में मान्यता रदद करने एवं एफआईआर करने के आदेश दिये थे।
जिसकी जांच डीईओ परमजीत सिंह गिल, डीपीसी दुबे ने की थी। लेकिन 8 माह से ज्यादा बीतने के बाद भी न तो स्कूल के खिलाफ एफआईआर कि गई न तो मान्यता रदद। इस पूरे मामले के प्रसाशनिक जि मेदारो कि पोल खुलती नजर आ रही है।
इस तरह स्कूल और डीलर्स मिलकर सेट बनाते हैं। इसमें कुछ बुक्स फेमस पब्लिशर्स की तो कुछ नए पब्लिशर्स की ली जाती हैं। कारण, नए पब्लिशर्स की बुक में सीबीएसई से रिलेटेड कुछ नहीं होता। उनमें जीके, मॉरल साइंस, करंट अफेयर्स, कंप्यूटर जैसी बुक्स होती हैं। इनकी कीमत बहुत ज्यादा और कमीशन भी 50 फीसदी से ज्यादा होती है।
हर बुक स्टोर्स के पास दर्जनों स्कूलों का ठेका है। केंद्रीय विद्यालय में एन सी ई आर टी का पहली क्लास का कोर्स 217 रुपए का तो प्राइवेट स्कूल का 1500 रुपए का। बुक डीलर्स के अनुसार स्कूल निजी प्रकाशकों की किताबें इसलिए लेते हैं, क्योंकि उन्हें डीलर्स से 40-50 फीसदी कमीशन मिलता है। स्कूल प्रबंधन बीच में नहीं आता। डीलर कमीशन का खेल सेट कर देते हैं। सत्र शुरू होने से पहले दिसंबर से फरवरी के बीच डीलर के एजेंट सब तय कर चुके होते हैं।
नियम का पालन नहीं
हर साल देखने में यह आता है कि निजी स्कूल शिक्षा विभाग के निर्देशों को अनदेखा करते हैं। इससे पालकों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है। निजी स्कूल स्टेशनरी की दुकान का नाम बताकर किताबें खरीदने अभिभावकों को बाध्य करते हैं।
बाजार में स्टेशनरी की दुकानों पर प्रिंट रेट पर ही किताबें दी जाती हैं, जिन्हें विवश होकर अभिभावकों को खरीदना पड़ता है। निजी स्कूलों और प्रकाशकों के मुनाफे के इस खेल में अभिभावक खुद को ठगा सा महसूस करता है। पालकों की मजबूरी हो जाती है कि उन्हें उसी दुकान से किताबें खरीदनी होती है।
हर साल बढ़ा दी जाती है फीस
प्रदेश में निजी इंजीनियरिंग और प्रबंधन कालेजों की तर्ज पर निजी स्कूलों में भी फीस के निर्धारण के लिए फीस नियामक बनाने का प्रस्ताव अभी कार्यवाही सिर्फ कागजों में है। मध्यप्रदेश में वर्तमान में कहीं भी निजी स्कूलों पर कितनी फीस वृद्धि हो या कितनी फीस रखी जाए, इस संबंध में कोई दिशानिर्देश नहीं है।
वर्तमान में पूरे प्रदेश में फीस निर्धारण या कितनी फीस ली जाए, इस संबंध में कोई मानक तय नहीं किए गए हैं। लेकिन शासन स्तर पर अवश्य कार्य हो रहा है। अगर फीस निर्धारण के मानक बनते हैं तो अभिभावकों के लिए राहत भरा होगा।