शिवपुरी। क्रोध से विवेक, मान से विनय, माया से प्रीति और लोभ से सबकुछ नष्ट हो जाता है, लोग लोभ के वशीभूत होकर न जाने कितनी वयवस्थाओं में लगे रहते हैं। इसलिये व्यवस्थित नहीं हो पा रहे हैं। अगर स्वंय व्यवस्थित हो जावें तो मोक्ष मार्ग आसान हो जायेगा।
उक्त उद्गार स्थानिय महावीर जिनालय में उत्तम मार्दव दसलक्षण धर्म के अवसर पर वहाँ चार्तुमास कर रहे पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य पूज्य मुनि श्री अभय सागर जी महाराज, पूज्य मुनिश्री प्रभातसागर जी महाराज एवं पूज्य मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज ने दिये।
पूज्य मुनि श्री प्रभातसागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में कहा कि- संसार में समस्त पापों की जड़ लोभ ही है, और इसी के कारण जीवन में अशुची बनी हुई है। यदि हमारा लोभ नष्ट हो जाये तो पवित्रता जीवन में आयेगी।
लोभ करना ही है तो सांसारिक वस्तुओं का न करें, वल्कि तप, ध्यान और स्वाध्याय आदि करने का लोभ करना चाहिये तो ये हमारे लिये कल्याणकारी हो सकता है।
पूज्य मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज ने कहा कि- जैसे अनेक नदियाँ समुद्र में मिल जायें, अनेक मुर्दे शमशान में जल जायें, शरीर को कितना भी खिलायें इनकी तृप्ति कभी नहीं हो सकती उसी प्रकार मनुष्य को चक्रवर्ती की संपदा भी मिल जाये तो भी उसके लोभ की तृप्ति नहीं हो सकती। इस लोभ के वशीभूत इंसान कितनी मायाचारी करता है।
मायाचारी का वर्तमान तो अच्छा हो सकता है परंतु भविष्य अंधकारमय ही रहता है। यही लोभ है जिसके कारण चक्रवर्ती जो मोक्ष जाने वाला होता है मरकर नरक पहुँच जाता है। अत: लोभ को छोड़ो और धर्म को सदा के लिये जीवन में अपनाओ तभी कुछ कल्याण संभव है।


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