दसलक्षण पर्व: संयम के बिना मनुष्य जीवन बिना ब्रेक की गाड़ी के समान , मुनिश्री

Updesh Awasthee
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शिवपुरी। मनुष्य का जीवन विना संयम के ऐसे ही है जैसे बिना ब्रेक के गाड़ी। गाड़ी में ब्रेक न हो तो उसमें बैठने बाले का जीवन खतरे में पड़ जाता है, उसी प्रकार जीवन में इन्द्रिय संयम न हो तो भौतिक जीवन के साथ आध्यात्म जीवन भी नष्ट हो जाता है।

देव, नरक, तिर्यन्च आदि योनियों में संयम धारण नहीं किया जा सकता। केवल मनुष्य पर्याय ही ऐसी है जहाँ संयम को धारण किया जा सकता है। अत: जीवन के उत्थान के लिये आज कुछ न कुछ संयम अवश्य धारण करें।

तभी हमारा जीवन सफल हो सकेगा। उक्त उद्गार स्थानिय महावीर जिनालय में उत्तम मार्दव दसलक्षण धर्म के अवसर पर वहाँ चार्तुमास कर रहे पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य पूज्य मुनि श्री अभय सागर जी महाराज, पूज्य मुनिश्री प्रभातसागर जी महाराज एवं पूज्य मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज ने दिये।

पूज्य मुनि श्री प्रभातसागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में कहा कि- जीवन में थोड़ा सा भी संयम पापों को मिटाने वाला होता है। उत्तम संयम जीवन में नियंत्रक का कार्य करता है।

जैसे नदी के उपर बाँध बना दिया जाये फिर उस बाँध के पानी का उपयोग बिजली बनाने आदि में किया जा सकता है, उसी प्रकार जीवन में संयम धारण करके ही इस आत्मा का उत्थान किया जा सकता है।


आज मनुष्य इंद्रियों का गुलाम बन कर रह गया है। खाने-पीने पर संयम रहा नहीं। सिर्फ भोग विलास में अपना जीवन व्यतीत किया जा रहा है। यही कारण है यह शरीर बीमारियों का घर बन गया है।

अगर खान-पान में षुचिता और समय का ध्यान रखा जाये तो ये नौबत न आये। हम दस दिनों में जैसा धर्म कर करे हैं ऐसा ही अगर जीवन भर करें तो जीवन का कल्याण हो जायेगा।

प्रवचनों के प्रारंभ में पूज्य मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज नें कहा कि- व्रत, उपवास आदि साधना जब की जायें तो सौभाग्य समझ के करना चाहिये भार समझ के नहीं। अगर भार समझ के धर्म कर रहे हैं तो समझना आपके जीवन में रंचमात्र भी धर्म नहीं आया।

भगवान की पूजन करते समय ऐसे भाव मन में आना चाहिये कि हे भगवान मैनें कौन से पुण्य किये जो आपकी पूजन करने का सौभाग्य मुझे मिला। व्रत-उपवास से आत्मा में प्रसन्नता अनुभव होनी चाहिये तभी धर्म है।

हमारा र्दुभाग्य है कि आज साक्षात तीर्थंकर का सानिध्य हमें नहीं मिल सकता। परंतु उन्हीं सदृश चर्या का पालन करने वाले मुनिराज हमें मिल रहे हैं ये हमारा सौभाग्य है।

जैसे मुनिराज जीवन में संयम को धारण करते हैं, उतना न कर सकें कोई बात नहीं परंतु जीवन में कुछ न कुछ इंद्रिय संयम का पालन जरूर करें। जिस मनुष्य के जीवन में संयम होता है वह इंद्रियों के राजा के समान होता है।

 वरना तो वह इन्द्रियों का गुलाम है जिसे कारावास मिलना ही है। अत: जीवन का उत्थान करना चाहते हो तो उत्तम संयम के दिन कम से कम कुछ संयम जीवन में अवश्य धारण करना। 
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