ब्राह्मण बाहुल्य शिवपुरी विधानसभा से कांग्रेस में उम्मीदवारी नहीं करते ब्राह्मण

shailendra gupta
शिवपुरी। विधानसभा क्षेत्र शिवपुरी में ब्राह्मण समुदाय के लोग चुनाव की दृष्टि से निर्णायक होने के बावजूद भी शिवपुरी विधानसभा से कांग्रेस में ब्राह्मण प्रत्याशियों की उम्मीदवारी को लेकर टोटा दिखाई देता है।
ब्राह्मणों के नाम पर कांग्रेस में राजनैतिक तौर पर जो लोग सक्रिय हैं उन्हें आसान तरीके से पोहरी विधानसभा दिखाई देती है। जबकि 1980 से 90 के बीच में 10 वर्ष तक निर्विावाद तरीके से ब्राह्मण विधायक गणेश गौतम ने यहां काम किया है। उसके बाद ब्राह्मण प्रत्याशी को लेकर कांग्रेस की तरफ से यहां 2003 के विधानसभा चुनाव में फिर से गणेश गौतम उम्मीदवार घोषित हुए थे जिन्हें करारी शिकस्त श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया ने दी थी। 10 वर्ष के भीतर दो विधानसभा के कार्यकाल पूर्ण होने पर ब्राह्मण वर्ग से किसी ने न तो उम्मीदवारी जताई और न ही कांग्रेस पार्टी की ओर से किसी को उम्मीदवार बनाया।         

अब जबकि 2013 का विधानसभा चुनाव सामने है इसमें कांग्रेस की ओर से किसी भी ब्राह्मण वर्ग के व्यक्ति का कोई नाम सामने नहीं आ रहा है बल्कि जो लोग कांगे्रस में रहकर ब्राह्मण वर्ग से राजनीति कर रहे हैं वह अपने लिए सरल रास्ता पोहरी विधानसभा क्षेत्र मानते हैं जबकि उनका विधानसभा क्षेत्र शिवपुरी में आता है इसमें रामकुमार शर्मा, विजय शर्मा, वीरेन्द्र शर्मा के अलावा अजयराज शर्मा ऐसे नाम हैं जो आज दमदारी से पोहरी विधानसभा के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित कराने के लिए कांग्रेस से प्रयासरत हैं। 1977 के बाद कै.माधव महाराज ने शिवपुरी में राजनैतिक रूप से जो सक्रियता प्रारंभ की थी उसमें गणेश गौतम, श्रीप्रकाश शर्मा व राजेन्द्र शर्मा ब्राह्मणों के नाम पर सबसे ज्यादा ताकतवर नेता माने जाते थे। 

    इनमें से श्रीप्रकाश शर्मा ने सिंधिया परिवार को सबसे पहले छोडा उसके बाद गणेश गौतम ने अपना पल्ला सिंधिया परिवार से झाड़ लिया। राजेन्द्र शर्मा ही एक मात्र ऐसे ब्राह्मण नेता हैं जो सिंधिया परिवार से जुडे हुए हैं लेकिन लगातार  राजनैतिक अवसर की असफलता ने उन्हें नेपथ्य में डाल रखा है। लोकसभा चुनाव 2004 में हरिवल्लभ शुक्ला व 2003 विधानसभा चुनाव में गणेश गौतम ने सिंधिया परिवार के खिलाफ जो शंखनाद किया था शायद उसकी परिणिती के तौर पर कांग्रेस में ब्राह्मण वर्ग से कोई भी शिवपुरी विधानसभा से अपने को चुनावी दृष्टि से मुफीद नहीं पाता है।

    शिवपुरी विधानसभा में नगर पालिका क्षेत्र के अंतर्गत 110 पोलिंग बूथ आते हैं। उसके बाद 140 पोलिंग ग्रामीण अंचल से हैं जिसमें घाटी नीचे और घाटी ऊपर दो भाग ग्रामीण क्षेत्र की पोलिंग से जुडे हुए हैं। घाटी नीचे की बात करें तो इसमें ब्राह्मण समुदाय फिर भी कम है पिछडे वर्ग और आदिवासियों की संख्या ज्यादा है लेकिन घाटी ऊपर और शहरी क्षेत्र की बात करें तो नगर पालिका क्षेत्र में लगभग 15 से 20 हजार ब्राह्मण परिवार निवास करते हैं और इसके अलावा घाटी ऊपर भी ब्राह्मणों का एक बडा वर्ग रहता है। अपने राजनैतिक जीवन की शुरूआत में कै. माधौ महाराज ने ब्राह्मण वर्ग से ही दो लोगों को राजनीति में सक्रिय किया था इसमें पोहरी से हरिवल्लभ शुक्ला और शिवपुरी से गणेश गौतम। 

    हरिवल्लभ शुक्ला तो 1985 में ही टिकिट न मिलने के कारण सिंधिया परिवार से टूट गए थे लेकिन गणेश गौतम ने अपनी यात्रा 2003 के विधानसभा चुनाव तक जारी रखी। यशोधरा राजे ङ्क्षसधिया से चुनाव लडऩे के बाद गणेश गौतम की भी ब्राह्मण नेता के रूप में सिंधिया परिवार में उल्टी गिनती शुरू हो गई थी और 2007 में उन्होंने उप चुनाव लडकर अपनी दूरियों का प्रमाण भी दे दिया। आज वीरेन्द्र शर्मा, रामकुमार शर्मा, अजयराज शर्मा की बात करें तो यह निर्विवाद तरीके से शिवपुरी विधानसभा में रहते हुए सिंधिया निष्ठ माने जाते हैं लेकिन शिवपुरी विधानसभा से इनकी दावेदारी सामने नहीं आती। श्रीप्रकाश शर्मा दिग्विजय सिंह के गु्रप में शामिल होकर अब सिंधिया से दूर हैं लेकिन उनकी बाक पटुता और बुद्विता ने आम आदमी के बीच जीवंतता बनाए रखी है। 

    वह भी शिवपुरी विधानसभा से अपनी दावेदारी करने से कतराते हैं। विजय शर्मा ने सिंधिया परिवार की उंगली पकड़कर राजनीति शुरू की थी लेकिन आज वह संगठन के नाम पर शिवपुरी की वजाए पोहरी से ही विधानसभा का टिकिट मांग रहे हैं। संख्याबल के आधार पर जातिगत रूप से राजनीति को तोडने का परिणाम 2007 के उप चुनाव में वीरेन्द्र रघुवंशी की विजय के रूप में सामने आया था और वैश्य समुदाय के साथ-साथ ब्राह्मण समुदाय को लेकर जो परिदृश्य संख्याबल के आधार पर आज नहीं है उसकी सिर्फ वजह इतनी है कि ब्राह्मण वर्ग से शिवपुरी विधानसभा में लोकसभा चुनाव 2004 व विधानसभा चुनाव 2003 में हरिवल्लभ शुक्ला व गणेश गौतम की सिंधिया परिवार के खिलाफ जीत न होना माना जा सकता है। शायद इसलिए शिवपुरी विधानसभा में ब्राह्मण प्रत्याशी अपनी उम्मीदवारी को करने से उस स्थिति में कतराते हैं जबकि संख्याबल में वह निर्णायक हैं।
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