शिवपुरी में कुपोषण का काला सच, कागजों पर सुधरती सेहत, जमीन पर दहशत

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शिवपुरी।
शिवपुरी जिले में कुपोषण का दानव एक बार फिर मासूमों को अपनी चपेट में ले रहा है। विभाग के सर्वे में कुपोषण काला सच भी बाहर आया है। जिले में 1,460 बच्चे अति कुपोषित (SAM) और 6,614 बच्चे कुपोषित चिह्नित किए गए हैं, फिर भी पोषण पुनर्वास केंद्रों (NRC) के 80 प्रतिशत बिस्तर खाली पड़े हैं। यह स्थिति उस जिले की है जहां सरकार हर साल कुपोषण मिटाने के नाम पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रही है।

The Dark Reality of Malnutrition in Shivpuri: Health Improves on Paper, While Terror Prevails on the Ground

जिले के सभी सात ब्लॉकों-बदरवास, पोहरी, करेरा, खनियाधाना, कोलारस, नरवर और पिछोर-में संचालित एनआरसी केंद्रों में करीब 80 प्रतिशत पलंग खाली हैं। हर केंद्र में 10-10 पलंग की व्यवस्था है, लेकिन भर्ती बच्चों की संख्या महज 1 से 3 के बीच सिमटी हुई है। जिला मुख्यालय के एनआरसी में भी स्थिति अलग नहीं है-20 पलंग वाले यूनिट-1 में सिर्फ 8 बच्चे और 10 पलंग वाले यूनिट-2 में केवल 1 बच्चा भर्ती है।

आंकड़े बता रहे हालात की भयावह तस्वीर
आंगनबाड़ी रिकॉर्ड के अनुसार जिले में 1,39,222 सामान्य बच्चे दर्ज हैं, जिनमें से 1,37,407 बच्चों का वजन किया जा चुका है। इसके बावजूद हर ब्लॉक में औसतन 150 से 250 अतिकुपोषित और 700 से 900 तक कुपोषित बच्चे सामने आ रहे हैं।

बदरवास में 267 अतिकुपोषित
पोहरी में 215
करेरा में 185 बच्चे दर्ज किए गए हैं
ये आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि जमीनी स्तर पर समस्या अब भी गंभीर बनी हुई है।

1400 करोड़ खर्च, फिर भी अधूरा असर
मध्यप्रदेश सरकार कुपोषण से निपटने के लिए हर साल करीब 1400 करोड़ रुपए खर्च कर रही है। पूरक पोषण आहार की दर भी बढ़ाई गई है- अब अति कम वजन वाले बच्चों पर प्रतिदिन 12 रुपए खर्च किए जा रहे हैं, जो पहले 8 रुपए थे। यह व्यवस्था 6 माह से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए लागू है।

हालांकि, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार कुछ सुधार जरूर हुआ है,कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत 33 से घटकर 22 प्रतिशत हुआ है और दुबलापन (वेस्टिंग) 19 प्रतिशत से घटकर 7 प्रतिशत तक आया है। लेकिन इसके बावजूद मध्य प्रदेश राष्ट्रीय औसत से पीछे बना हुआ है।

क्यों खाली हैं एनआरसी
एनआरसी केंद्रों के कर्मचारियों के अनुसार, वे समय-समय पर जिला कार्यक्रम अधिकारी को पत्र लिखकर बच्चों को भर्ती कराने की मांग करते हैं। लेकिन महिला एवं बाल विकास विभाग का कहना है कि जब आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बच्चों के परिजनों को एनआरसी भेजने के लिए समझाती हैं, तो कई परिवार इनकार कर देते हैं।

जिम्मेदारी और हकीकत के बीच फंसा सिस्टम
जिला कार्यक्रम अधिकारी डीएस जादौन का कहना है कि “हम कुपोषण खत्म करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अभी यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। एनआरसी में केवल चिन्हित बच्चों को ही भर्ती किया जाता है, इसलिए केंद्र खाली नजर आते हैं।

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