कोलारस: जहां किसान नहीं पटवारी करते हैं आत्महत्याएं, कलेक्टर नहीं करते कार्रवाई

shailendra gupta
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राजू(ग्वाल)यादव
शिवपुरी। एक पटवारी ने तहसीलदार की प्रताडऩा से व्यथित होकर अपने प्राण त्यागने का फैसला कर लिया लेकिन क्या उसके इस फैसले से इस दुनिया से विदा लेने के बाद एक प्रशासनिक अधिकारी पर लगाए गए इस तरह के आरोपों के बाद जिला प्रशासन कोई सबक ले पाएगा। हम इशारा ही नहीं बल्कि स्वयं जिला प्रशासन  को अपने रवैये को सुधारने की हिदायत देते है कि यदि जिला प्रशासन ने अपने प्रशासनिक टीम के साथ सामंजस्य नहीं बिठाया तो उसके कई गंभीर परिणाम भी भुगतने पड़ सकते है।
जी हां! यह कोई आरोप प्रत्यारोप की चर्चा नहीं है। यह शिवपुरी के हालातों को बयां करती वे बातें है जिससे असमय काल के गाल में समाए मृतक पटवारी फिरोज ने प्रशासन को स्वयं सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वाकई शिवपुरी में जिला प्रशासन अपने रवैये के मुताबिक कार्य कर रहा है? यदि नहीं तो इसे शीघ्र दुरूस्त किए जाने का अवसर है।

जिले का कोलारस क्षेत्र बीते कुछ वर्षों से सुर्खियां बटोर रहा है लेकिन यह कोई अच्छे कारणों से नहीं बल्कि उन कारणों से जिससे प्रशासन की छवि पर गहरा असर पड़ता नजर आएगा। कोलारस में आज से तीन वर्ष पूर्व पटवारी प्रकाश खटीक भी इसी तरह आत्मघाती कदम उठाकर अपने प्राण त्याग चुका है। जहां उसने यह सभी आरोप एसडीएम कोलारस पर लगाए और मानसिक प्रताडऩा से तंग आकर अपने खुशहाल परिवार को छोड़ उसने इस दुनिया से अलविदा कह दिया।

अभी भी इस मामले में कोई कार्यवाही प्रशासन द्वारा नहीं की गई ना तो सुसाईड नोट में लिखित शिकायत जड़कर गए पटवारी प्रकाश खटीक की सुनवाई हुई और ना ही उसके परिजनों को अनुकम्पा नियुक्ति अथवा उसके परिवार की सुध लेने की कोई नैतिक जिम्मेदारी। इसी तरह एक घटनाक्रम पुन: घटा 11 फरवरी को जब शिवपुरी निवासी पटवारी फिरोज खान ने तहसीलदार कोलारस लक्षीराम कोली की प्रताडऩा से क्षुब्ध होकर अपने प्राण त्यागना ही मुनासिब समझा और शहर से दूर जाकर सांख्य सागर झील में आत्महत्या कर ली।

अपने भरे-पूरे परिवार के प्रति जिम्मेदारी का निर्वहन करने वाले फिरोज का यह कदम पूरे परिवार पर नहीं बल्कि अन्य पटवारियों और मुस्लिम संप्रदाय पर गहरा घाव कर गया। जहां अब तक पुलिस द्वारा इस मामले में कोई एहतियाती कार्यवाही नहीं की गई। जिसका परिणाम यह है कि आज पटवारी खुलेआम कोलारस प्रशासन पर ऊंगली उठा रहे है तो वहीं मृतक के परिजन भी न्याय की आस लगाए हुए है। इस तरह की घटनाओं से प्रशासन को सबक लेने की आवश्यकता है।

शासन द्वारा सौंपे जाने वाला कोई भी कार्य हो उस पर यदि किसी कर्मचारी पर अधिक दबाब बनाया जाए तो निश्चित रूप से उसके कई गंभीर परिणाम निकलकर सामने आऐंगे। इसके लिए स्वयं आत्मवलोकन करना चाहिए कि क्या वाकई वह इस काबिल है जो दिए गए कार्य को बिना किसी दबाब के पूर्ण कर सके। इसलिए जिला प्रशासन को अपने कार्यप्रणाली में सुधार कर अपने अधीनस्थ अमले को सजग तो करना चाहिए लेकिन दबाब या अनैतिक कार्य करने पर मजबूर नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे एक भोले-भाले परिवार पर विपदाओं का पहाड़ टूट जाता है।

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