शिवपुरी में हुआ डाकुओं का मुंहकाला

shailendra gupta
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सेन्ट्रल डेस्क
खूनखराबा डाकुओं के लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन सैंकड़ों साल के इस लम्बे डकैत इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ कि डाकुओं ने किसी गरीब व्यक्ति को लूटा हो या किसी महिला के साथ बलात्कार किया हो। सामान्यत: डाकू धनाठ्य परिवार की महिलाओं को भी नहीं लूटते, बल्कि अविवाहित बालिकाओं के चरण स्पर्श करके उन्हें दक्षिणा दिया करते हैं। लेकिन बीते रोज जो हुआ उसने डाकुओं का मुंहकाला कर दिया। इससे ज्यादा शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता। आप खुद पढि़ए ये रिपोर्ट :-




शनिवार की रात मनपुरा निवासी फूलसिंह नरवरिया एवं उनका भाई कैलाश अपने घर में थे। रात्रि लगभग 11.30 बजे पांच हथियारबंद डाकू उनके घर में घुस आए और महिला-पुरुषों से मारपीट करते हुए महिलाओं के सोने-चांदी के जेवरात व नगदी समेट ली। इतना ही नहीं डाकुओं ने दो युवतियों के साथ ज्यादती भी की। लगभग एक घंटे तक लूटपाट करने के बाद बदमाश भाग गए। सूचना मिलने पर रविवार को पुलिस अधीक्षक आरपी सिंह भी मनपुरा पहुंचे और उन्होंने पीड़ितों की बात सुनी। भौंती पुलिस ने अज्ञात बदमाशों के खिलाफ डकैती का मामला दर्ज कर लिया है।

ये डाकू क्या होते हैं

ग्वालियर चंबंल क्षेत्र में डाकू समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि सैंकड़ों साल पुरानी है। महाराजा सिंधिया से लेकर अंग्रेजों तक और फिर भारत संघ के गठन के बाद बनीं तमाम सरकारें इस डकैत समस्या से जूझतीं रहीं। यहां डाकुओं को बागी भी कहा जाता है। पहले वो लोग जो राजा के खिलाफ विद्रोह करते थे, डाकू कहलाए जाते थे, और आजादी के बाद पुलिस की दमनात्मक कार्रवाईयों के खिलाफ जो लोग हथियार उठाते हैं उन्हें डाकू कहा गया। ये हत्याएं और लूटपाट करते हैं, लेकिन इनका अपना एक धर्म होता है। सामान्यत: माँ काली या माँ दुर्गा के भक्त उन लोगों की हत्याएं करते हैं जो समाज के साथ अन्याय करते हैं एवं उन लोगों को लूटते हैं जिन्होंने अवैध रास्तों से पैसा कमाया और गरीबों का खून चूसा। 

कई डाकू तो अमीरों को लूटकर गरीबों में बांटा करते थे। अंग्रेजी शासन के समय इन्हीं डाकुओं ने अंग्रेजों के खजाने लूटे और कई अधिकारियों की हत्याएं कीं। इन्होंने खुद को कभी क्रांतिकारी भी नहीं कहा। 

डाकू सामान्यत: छापामार युद्धकला में पारंगत होते हैं। इस नएयुग की भाषा में कहें तो किसी भी वारदात को करने से पहले वे पूरी तरह से रैकी करते हैं। पूरी जानकारी जुटाते हैं, और बिना किसी पर्याप्त कारण के कभी किसी पर हाथ नहीं उठाते। यहां तक कि उन पर हमला करने वाली पुलिस को भी वे इसलिए छोड़ देते हैं, क्योंकि वर्दी के भीतर छिपा इंसान एक निर्दोष नागरिक है और यदि वह गोली चला भी रहा है तो यह उसकी ड्यूटी है। 

कुल मिलाकर डाकुाओं के अपने सिद्धांत हुआ करते हैं जिसका पालन वे हर हाल में करते हैं। डाकुओं की वचनबद्धता की हजारों कहानियां चंबल में सुनी जा सकतीं हैं। वे संकल्प के धनी होते हैं और दिखने में भले ही खूंखार रहें लेकिन संवेदनशील होते हैं। 

पिछले पांच सौ साल के इतिहास में डाकुओं ने कभी किसी महिला या बच्चे पर कोई अत्याचार नहीं किया। यहां तक कि थप्पड़ तक नहीं मारा, इसके उलट उन्हें स्नेह, आदर और सम्मान दिया।
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