शिवपुरी-स्थानीय श्री चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर निचला बाजार पर आचार्य सन्मति सागर महाराज की हीरक जयंती धूमधाम से मनाई गई। सोमवार की सुबह इस मौके पर दो दिन के लिए शिवपुरी पधारे मुनि प्रसन्न सागर ने कहा कि सन्मति सागर भारत के इकलौते तपस्वी आत्मसाधक थे प्यारेलाल एवं जयमाला के घर जन्मे आचार्य श्री का जन्म 1938 में जिला ऐटा के ग्राम फफोतू यूपी में हुआ था। गृहस्थ अवस्था का नाम चिरंजीलाल था।
उन्होंने आचार्य महावीर कीर्ति से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया और नमक का त्याग कर दिया। बाद में आचार्य विमल सागर से झुल्लक एवं मुनिदीक्षा ग्रहण की और शक्कर एवं घी का त्याग कर दिया। 1972 में आचार्य पदग्रहण करते ही उन्होंने अन्न त्याग दिया था। मुनिश्री ने बताया कि आचार्य श्री ने अपने 50 साल के संत जीवन में थूका नहीं, वे कभी दवे नहीं बल्कि दबंग बनकर जिए। उन्होंने सामाजिक स्वाध्याय प्रतिक्रमण से समझौता नहीं किया, जीवन एवं साधना के अंतिम 10 वर्षों में 48 घंटों में सिर्फ एक बार छाछ, पानी लेते थे।
प्रत्येक वर्ष की तीनों अष्टाद्विनका, पर्युषण एवं सोलह कारण में निर्जरा उपवास करते थे। 1973 में केबल दाल का पानी लेकर पर्वतराज श्री सम्मेद शिखर की 108 बंदना की, अपनी जिनदीक्षा के 35-40 वर्षों में लगभग 250 जिन दीक्षाएं प्रदान कीं, 24 घंटे में 2 से ढाई घंटे श्वानवत् नींद लेते थे, न उन्होंने चटाई ओढ़ी, न बिछाई। प्रत्येक दो माह में उत्कृष्ट केशलोच करते थे। अपने संतजीवन काल में आचार्यश्री ने 8 हजार से अधिक उपवासों की साधना की। उन्होंने कभी किसी से कुछ नहीं मांगा और जो था उसे अपना माना नहीं।
उन्होंने बोला कम और जिया ज्यादा। शिवपुरी शहर में सन्मति सागर की हीरक जयंती के मौके पर आचार्य पुष्पदंत सागर के शिष्य प्रसन्न सागर ने उनके जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालने से पहले अष्टद्रव्य से संगीतमय पूजन किया और बाद में विनयांजलि दी गई। इस अवसर पर जैन समाज के बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।

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