शिवपुरी सीवर प्रोजेक्ट मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट की कमेटी गठित, 110 करोड़ कहां खर्च हुए

vikas
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Gwalior High Court

शिवपुरी। शिवपुरी शहर को सीवर और झील प्रदूषण की समस्या से निजात दिलाने के लिए शुरू किया गया बहुचर्चित सीवर प्रोजेक्ट अब सवालों के घेरे में आ गया है। तीन साल में पूरा होने वाला यह प्रोजेक्ट 12 साल बाद भी अधूरा पड़ा है, जबकि इस पर अब तक करीब 110 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ग्वालियर ने अब इसकी जमीनी हकीकत जानने के लिए कमेटी गठित कर शिवपुरी भेजने के आदेश दिए हैं।

दरअसल, शहर की गंदगी और सीवर का पानी नालों के जरिए जाधव सागर होते हुए टाइगर रिजर्व क्षेत्र स्थित चांदपाठा झील और माधव लेक तक पहुंच रहा है। इसी गंदगी के कारण झीलों में जलकुंभी तेजी से फैल रही है, जो अब पर्यावरण और पर्यटन दोनों के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।

मार्च 2024 में जलकुंभी संकट को लेकर हाईकोर्ट ग्वालियर में जनहित याचिका दायर की गई थी। इसमें कलेक्टर शिवपुरी, नगर पालिका, पीएचई विभाग और माधव टाइगर रिजर्व प्रबंधन को पक्षकार बनाया गया। 5 मई 2026 को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने पीएचई विभाग से जवाब तलब किया। कोर्ट ने सवाल उठाया कि आखिर 110 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी सीवर प्रोजेक्ट चालू क्यों नहीं हो सका।

19 मई को शिवपुरी पहुंचेगी कोर्ट की टीम

हाईकोर्ट ने मामले की सच्चाई जानने के लिए वकीलों की एक टीम को लोकल कमिश्नर नियुक्त किया है। इसमें एनके गुप्ता, अंकुर माहेश्वरी, अक्षत जैन और फैजान अहमद कुरैशी शामिल हैं। यह टीम 19 मई 2026 को शिवपुरी आकर प्रोजेक्ट का निरीक्षण करेगी और 15 जून तक अपनी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करेगी।

कोर्ट ने डीएफओ, पीएचई के मुख्य अभियंता और कार्यपालन यंत्री को निरीक्षण के दौरान मौजूद रहने और पूरी सहायता देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही पीएचई विभाग को यह आदेश भी दिया गया है कि निरीक्षण से पहले सीवरेज सिस्टम में किसी प्रकार का बदलाव न किया जाए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

सीवर लाइन में मलबा, हजारों चैंबरों की सफाई बाकी

सीवर प्रोजेक्ट की हालत यह है कि शहर की सीवर लाइनों में भारी मात्रा में मलबा भरा पड़ा है। रोजाना मजदूरों द्वारा केवल 6 से 7 चैंबरों की सफाई हो पा रही है। कुल 4125 चैंबरों में से 2500 से अधिक की सफाई अभी बाकी है। वहीं 40 से ज्यादा चैंबर क्षतिग्रस्त बताए जा रहे हैं, जिनकी मरम्मत होना बाकी है। बरसात से पहले काम पूरा करने का दावा जरूर किया जा रहा है, लेकिन मशीनें उपलब्ध नहीं होने से अभी मैनुअल सफाई कराई जा रही है।

नाला ट्रैपिंग बना अस्थायी समाधान

हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान पीएचई विभाग ने जाधव सागर के नीचे नाला ट्रैपिंग की अस्थायी व्यवस्था की है, ताकि गंदगी झीलों तक न पहुंचे। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि तेज बारिश होने पर यह व्यवस्था पूरी तरह फेल हो सकती है और गंदगी फिर से चांदपाठा झील में पहुंच जाएगी। इसके साथ नालों में पनप रही जलकुंभी भी झीलों में फैलती रहेगी।

69 करोड़ से शुरू, 110 करोड़ तक पहुंची लागत

झील संरक्षण योजना के तहत शहर की तीन प्रमुख झीलों को दूषित होने से बचाने के लिए वर्ष 2013 में करीब 69 करोड़ रुपए की लागत से प्रोजेक्ट मंजूर किया गया था। इसके तहत 109 किलोमीटर लंबी सीवर लाइन और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनना था। लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी प्रोजेक्ट अधूरा है और इसकी लागत बढ़कर 110 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है।

पीएचई और टाइगर रिजर्व आमने-सामने

हाईकोर्ट में पीएचई विभाग ने दावा किया कि जाधव सागर, सांख्य सागर और माधव झील में अब अपशिष्ट जाना बंद हो चुका है। वहीं माधव टाइगर रिजर्व के रेंजर ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि झीलों में अभी भी गंदगी और कचरा पहुंच रहा है।

अधिकारी बोले- ठेकेदार को नोटिस जारी

लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के कार्यपालन यंत्री शुभम अग्रकरण ने बताया कि सीवर चैंबरों की सफाई के लिए मजदूरों की संख्या बढ़ाई गई है। मशीनें उपलब्ध नहीं होने के कारण फिलहाल मैनुअल सफाई कराई जा रही है। बरसात से पहले काम पूरा कराने के लिए ठेकेदार को नोटिस भी जारी किया गया है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट की टीम 19 मई को आकर यह भी जांच करेगी कि तालाबों में वास्तव में गंदगी जा रही है या नहीं।

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