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नव सम्वत्सर विशेष: भारतीय परम्परा में सूर्य और चंद्र की गतिशीलता है काल गणना का मूलाधार

शिवपुरी। राष्ट्रीय स्वाभिमान और गरिमा के लिए यह आवश्यक है कि हम स्वदेशी सम्वत्सर को ही महत्व दें। इसी दिन हम अपने मित्रों, सहयोगियों एवं परिजनों को नव वर्ष की बधाई दें ताकि राष्ट्रीय अस्मिता के लिए यह पर्व उपयोगी सिद्ध हो। हमें अपने पत्रों बुलेटिनों आदि में भी सम्वत्सर का प्रयोग युगाब्ध तथा विक्रमी संवत के रूप में होना चाहिये।

भारतीय परम्परा में सूर्य और चन्द्र की गतिशीलता को काल गणना का मूलाधार माना गया है। सम्वत्सर के अनुसार प्रत्येक माह चन्द्रमा पर आधारित होता है। हम सभी जानते हैं कि चन्द्रमा का आकार घटता बढ़ता रहा है, इसी के अनुसार तिथियों का नामकरण भी हुआ है। पृथ्वी पर सूर्य और चन्द्रमा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी पर प्रचलित अनेक प्रकार के कैलेण्डरों में कुछ वर्ष चन्द्रमा की कलाओं पर और कुछ सूर्य की गति पर आधारित हैं, जिन्हें क्रमशः चन्द्र वर्ष और सौर वर्ष कहा गया है। सूर्य की गति को बारह राशियों में बांटा जाता है, इसलिए प्रचलित सभी कैलेण्डरों में 12 महीनों की ही कल्पना की गई है। 

सम्वत्सर तो अनादि काल से चला आ रहा है परन्तु युग अथवा किसी किसी महापुरुष के नाम से प्रचलित वर्ष की गणना तदनुसार की जाती है। चारों युगों की अपनी-अपनी अवधि है और कहीं कहीं तो अपने धार्मिक गुरुओं को सम्मान देते हुए भी कुछ संवत प्रचलित हुए हैं जैसे बौद्ध संवत 2547, महावीर संवत 2531, नानक संवत 537, दयानंद संवत 1801 आदि। भारत सरकार के कैलेण्डरों पर शक संवत अंकति रहता है जबकि मुस्लिम देश अपने नए साल को 'हिजरी' के नाम से पुकारते हैं।

इन सबके बावजूद ईस्वी सन का अपना अलग ही महत्व है। ईस्वी सन मुख्यतः सौर वर्ष है अर्थात चन्द्रमा की कलाओं का अथवा किसी भी अन्य ग्रह की कला का उससे कोई संबंध नहीं है। विक्रमी संवत के ठीक 57 वर्ष बाद से इसे अंग्रेजों ने अपनाया। इसमें संदेह नहीं कि इसका प्रचलन प्रायः विश्व स्तर पर मान्य है क्योंकि इसके महीनों के दिवस और तारीख स्मरण करने में अपेक्षाकृत सरल है। विक्रमी संवत के चन्द्र कलाओं पर आधारित होने के फलस्वरूप चन्द्रमा के घटने बढऩे से जो तिथियों में परिवर्तन होता है। 

वह सर्व ग्राह्य तो नहीं बन पाया परन्तु उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य को शकारि विक्रमादित्य की संज्ञा देकर जिस हिन्दू राष्ट्र को गौरव प्रदान किया गया वह अपने में विशेष महत्व रखता है। हमें अपने सभी मांगलिक कार्य इसी संवत (विक्रमी संवत) से करना चाहिये यदि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाना चाहते हैं। 

आइये! चैत्र शुल्क प्रतिपदा 2076 (तदनुसार 6 अप्रैल 2019) को हम सब मिलकर अपने उस स्वर्ण युग और स्वर्ण पुरुष का एक बार पुनः स्मरण करें जिसकी शूरवीरता के कारण हिन्दुओं का सिर ऊंचा हो सका। 


कैसे मनाएं नवसम्वत्सर:-
आगामी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 2076 तदनुसार 6 अप्रैल 2019 से विक्रम संवत का शुभारंभ हो रहा है इस दिन को हम सब मिलकर इसे उत्साहपूर्वक मनाने में लिए किए जा सकने वाले कुछ कार्यक्रम निम्नानुसार हैं-

हमारा नव वर्ष सूर्योदय से प्रारंभ होता है, मध्य रात्रि से नहीं। अतः सूर्योदय से 10 मिनट पूर्व से लेकर 5 मिनट पश्चात तक अपने घर एवं मंदिरों में सामूहिक रूप से या अकेले ही घंटे, घंटियां बजाकर या शंखनाद करकेे नव वर्ष का स्वागत करें एवं प्रभात फेरियां निकालें। 

सुप्रभात बेला में मिश्री, नीम की कोपलें व काली मिर्च का सेवन करें। 
अपने घर, दुकान, मंदिर, वाहन इत्यादि की सजावट करें, ओ३म का पताका फहराएं। 
व्यक्तिशः दूरभाष, बधाई कार्ड के माध्यम से नव वर्ष की बधाईयां दें। 
अपने घरों में कोई विशेष मिष्ठान्न बनाएं। 
प्रमुख स्थानों पर होर्डिंग्स, बैनर लगाएं। 
नव वर्ष की पूर्व संध्या पर गोष्ठी, कवि सम्मेलन का आयोजन करें। 
दूरस्थ रहने वाले अपने प्रियजनों, मित्रों इत्यादि को शुभकामना पत्रिकाएं भेजें। 
प्रमुख चैराहों पर रंगोली सजाएं, लोगों को तिलक लगाएं, ठंडाई पिएं व पिलाएं। 
सायंकाल जलाशयों में सामूहिक दीपदान का कार्यक्रम करें। 
नव वर्ष की जानकारी से संबंधित पत्रक छपवाकर आम जनता में वितरित करें।


अनिल कुमार अग्रवाल,वरिष्ठ लेखक और समाजसेबी है।