जिले की 4 सीटो पर भाजपा डेजंर जॉन में, पोहरी-करैरा सीट पर कांग्रेस नेताओ का भविष्य संकट में

शिवपुरी। मप्र विधानसभा के चुनावो ने दस्तक देनी शुरू कर दी है। कांग्रेस इस बार बसपा, सपा और गोड़वाना गणतंत्र पार्टी के साथ चुनाव लडने की तैयारी कर रही है। अगर कांग्रेस का बसपा सहित अन्य पार्टिया के साथ गठबंधन करती है तो जिले  की 5 विधानसभा सीटो में से 2 सीटो पर डेंजर जॉन में है। इसके अतिरिक्त पोहरी और करैरा सीट पर कांग्रेस से टिकिट मांग रहे नेताओ के इस वार विधायक बनने पर संकट है। 

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कांग्रेस 20 सीटें बहुजन समाज पार्टी के लिए तथा 5-5 सीटें गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और समाजवादी पार्टी के लिए छोड़ेगी। जहां तक शिवपुरी जिले की विधानसभा सीटों का सवाल है तो सूत्रों का कथन है कि इनमें से पोहरी अथवा करैरा सीट बसपा के लिए छोडी जा सकती है। सूत्र तो यहां तक कहते है कि जो सीटे अन्य दलों के लिए कंाग्रेस छोड़ेगी उनमें यदि अन्य दलों के पास कोई मजबूत प्रत्याशी नहीं है तो कांग्रेस प्रत्याशी अन्य दलों के चुनाव चिन्ह पर मैदान में उतरेंगें। 

2014 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 230 में से 165 सीटें जीती थीं। जबकि कांग्रेस महज 55 सीटों पर सिमट गई थी। उस चुनाव में कांग्रेस अकेले चुनाव मैदान में उतरी थी और बसपा गौंडवाना गणतंत्र पार्टी तथा समाजवादी पार्टी भी चुनाव लड़ी थी। 

जहां तक शिवपुरी जिले का सवाल है, यहां की पांच विधानसभा सीटों में से करैरा और पोहरी में बहुजन समाजपार्टी की स्थिति बहुत मजबूत है। करैरा में तो बसपा प्रत्याशी लाखन सिंह बघेल 2003 में विधानसभा चुनाव जीते थे और पोहरी विधानसभा सीट पर भी बसपा खासी मजबूत है और यहां इस दल के 20 से 25  हजार वोट हैं। 2008 के विधानसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी हरिवल्लभ शुक्ला ने कांग्रेस प्रत्याशी को पीछे छोड़ दिया था। हालांकि वह भाजपा प्रत्याशी से मात खा गए थे। 

करैरा और पोहरी के अलावा बसपा की स्थिति कोलारस विधानसभा क्षेत्र में भी खासी मजबूत है और 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी चंद्रभान सिंह यादव को लगभग 25 हजार मत प्राप्त हुए थे। इन तीनों विधानसभा क्षेत्रों में यदि कांग्रेस का बसपा से गठबंधन हो जाता है तो भाजपा की राह काफी मुश्किल हो सकती है। 2013 के विधानसभा चुनाव में इन तीनों सीटों में से भाजपा सिर्फ पोहरी सीट पर विजयी हुई थी। 

शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र में भी बसपा का ठीकठाक प्रभाव है और इस विधानसभा क्षेत्र में बसपा 8 से 10 हजार मत प्राप्त करती रही है। बसपा प्रत्याशी के मैदान में उतरने से भाजपा को खासा फायदा पहुंचता है। वैसे शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र में अन्य चार विधानसभा क्षेत्रों की तुलना में भाजपा की स्थिति खासी मजबूत है। भाजपा के पास इस विधानसभा क्षेत्र में यशोधरा राजे के रूप में एक मजबूत प्रत्याशी भी मैदान में है। 

इस कारण कांग्रेस बसपा से गठबंधन कर यहां भाजपा को खतरे में डालने की स्थिति में नहीं है। जिले की पिछोर विधानसभा सीट पर बसपा का प्रभाव अधिक नहीं है। लेकिन इस क्षेत्र में कांग्रेस की स्थिति खासी मजबूत है। कांग्रेस प्रत्याशी केपी सिंह  पिछोर विधानसभा क्षेत्र से 1993 से जीतते आ रहे हैं। 

1993 से लेकर 1998, 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव में उनकी जीत का अंतर लगभग 20 हजार मतों का था लेकिन 2013 के विधानसभा चुनाव में केपी सिंह चुनाव जीत तो गए परंतु बाहरी भाजपा प्रत्याशी प्रीतम लोधी ने उन्हें लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया। केपी सिंह किसी तरह महज साढ़े 6 हजार मतों से चुनाव जीत पाए। 

पिछले चुनाव में जिले में भाजपा की स्थिति रही थी कमजोर 
2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भले ही अन्य दलों से गठबंधन कर चुनाव मैदान में नहीं उतरी थी। इसके बाद भी शिवपुरी जिले की पांच सीटों पर कांग्रेस की स्थिति बहुत मजबूत रही थी और उसने कोलारस, करैरा एवं पिछोर विधानसभा सीटों पर कब्जा जमा लिया था। 

भाजपा ने भले ही पे्रदेश में अपनी विजय पताका फहराई हो लेकिन शिवपुरी जिले में उसका प्रदर्शन काफी कमजोर रहा था और वह महज 2 सीटों पर सिमट गई थी। इनमें से एक सीट पर तो भाजपा की ताकतवर नेत्री यशोधरा राजे विजयी हुई थीं। 

कुल मिलाकर भाजपा की 5 सीटो पर 4 सीट पर डेजंर जॉन में है। पोहरी और करैरा अगर बसपा के खाते में जाती है तो दोनो सीटो से कांग्रेस की ओर से टिकिट मांग रहे नेताओ का भविष्य भी संकट में  है। जिले मेें केवल शिवपुरी विधानसभा सीट ही ऐसी है जो सैफ मोड में दिख रही है। 
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