जैसे-जैसे श्लोक पढते गए वैसे-वैसे ताले टूटते गए: बडी शक्ति है इस पाठ में

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शिवपुरी। चैत्र बदी नवमी को जैन धर्म के प्रवर्तक प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभ देव) के जन्म और दीक्षा कल्याणक के अवसर पर शहर के जैन मंदिरों में विशेष अभिषेक, शांतिधारा पूजा-पाठ के साथ-साथ विशेष श्री भक्तामर विधान का आयोजन श्री चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर व आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में बड़ी धूमधाम से किया गया। 

श्रावक-श्राविकाओं ने देवाधिदेव आदिनाथ भगवान के जन्म व दीक्षा कल्याणक पर आदिनाथ भगवान की अष्ट द्रव्यों से पूजा-अर्चना की वहीं महापूजन करते हुए श्रद्धालुओं ने विश्व मंगल व कल्याण की प्रार्थना करते हुए सबके सुख-समृद्धि की कामना की। 

प्रात:काल में श्री आदिनाथ जिनालय में श्री भक्तांबर विधान एवं आचार्य गुरुवर श्री विद्यासागर महाराज की पूजा की गई। दोपहर में मरूदेवी महिला मंडल द्वारा श्री भक्तामर स्त्रोत की आराधना एवं कीर्तन का आयोजन किया गया। सांयकाल में विशेष आरती एवं उसके बाद पाठशाला के बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम किए गए। 

उल्लेखनिय है कि जैन परम्परा में अति विश्रुत भक्तामर स्तोत्र के रचयिता श्री मानतुंगाचार्य हैं। एक समय जब राजा भोज के शासनकाल में कई धर्मावलंबी अपने धर्म का चमत्कार बता रहे थे। तब महाराजा भोज ने श्री मानतुंगाचार्य से आग्रह किया, आप हमें चमत्कार बताएँ। 

आचार्य मौन हो गए। तब राजा ने अड़तालीस तालों की एक श्रृंखला में उन्हें बंद कर दिया। मानतुंगाचार्य ने उस समय आदिनाथ प्रभु की स्तुति प्रारंभ की। जब वह स्तुति में लीन हो गए, और ज्यों-ज्यों श्लोक बनाकर वे बोलते गए, त्यों-त्यों ताले टूटते गए। 

सभी ने इसे बड़ा आश्चर्य माना। इस आदिनाथ-स्तोत्र का नाम भक्तामर स्तोत्र पड़ा, जो सारे जैन समाज में बहुत प्रभावशाली माना जाता है तथा अत्यंत श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है। इसके चमत्कारिक प्रभावों के बारे में विदेशों में भी कई सफल प्रयोग कये गये हैं, और आज कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी का भी इलाज इस स्त्रोत के माध्यम से किया जा रहा है।
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